ह वाक़ई एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि हर क़दम पर वह प्रक्रिया बदलनी पड़ रही है जिसके माध्यम से वैक्सीन तैयार किया जाता है। मैसाचूसेट्स स्थित अंतर्राष्ट्रीय संस्था में मैनेजमेंट साइंस फ़ार हेल्थ की सीईओ और अध्यक्ष मारियन वेंटवर्थ कहती हैं कि यह वाक़ई इस बात पर निर्भर है कि आप वैक्सीन बना लेने से क्या अर्थ ले रहे हैं। यदि आप का तात्पर्य वह वैक्सीन है जो व्यापक स्तर पर चलाए जाने वाले टीकाकरण अभियान में प्रयोग किया जाए तब तो सही है कि इसमें 12 से 18 महीने लेगेंगे।
लेकिन अगर आप ऐसा वैक्सीन बनाना चाहते जो सीमित स्तर पर प्रयोग किया जाए जैसे चिकित्सा कर्मियों के लिए आप प्रयोग करना चाहते हैं जो इस महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में फ़्रंटलाइन पर हैं तो यह वैक्सीन कुछ हफ़्तों या कुछ महीनों में तैयार हो सकता है। डब्ल्यूएचओ के मापदंडों का पालन करते हुए यह काम अफ़्रीक़ा में फैलने वाली इबोला महामारी के लिए किया गया था।
आक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी ने कहा था कि गर्मी का मौसम आने तक वैक्सीन तैयार हो जाएगा तो वह इसी प्रकार के वैक्सीन की बात थी। सारा गिलबर्ट के नेतृत्व में वैक्सीन पर काम करने वाली टीम ने यह बात कही है कि क्लिनिकल ट्रायल के तीसरे चरण में वैक्सीन सफल रहा है और पतझड़ के मौसम से पहले इसका व्यापक उत्पादन शुरू होने की संभावना है।
कोई भी वैक्सीन किसी जानवर पर टेस्ट किए जाने से पहले लैब में तैयार किया जाता है। जब क्लिनिकल टेस्ट से पहले के चरण में इसका अच्छा और सुरक्षित नतीजा मिल जाता है तो फिर उसका क्लिनिकल टेस्ट शुरू होता है। यह टेस्ट तीन चरणों में होता है और हर अगले चलण में पिछले चरण से ज़्यादा लोगों पर इसको टेस्ट किया जाता है।
किसी भी वैक्सीन को लाइसेंस देने की प्रक्रिया भी लंबी होती है जिस पर कुछ लोगों को आपत्ति भी है। लंदन स्कूल आफ़ हाईजीन एंड ट्रोपिकल मेडिसिन नामक वैक्सीन सेंटर के अध्यक्ष बीट कैम्पमैन का कहना है कि अब जब महामारी सामने है तो वह लंबी प्रक्रिया मददगार नहीं है।
बोस्टन स्थित बायोटेक फ़र्म मोडर्ना ने तो 16 मार्च को ही कह दिया कि वैक्सीन बहुत जल्द तैयार हो जाएगा।
मगर सच्चाई यह है कि इस काम में बहुत सी अड़चनें हैं। अब तक कोविड-19 के जितने भी वैक्सीन पर काम हुआ है उनमें से कोई भी लाइसेंस हासिल करने के स्टेज तक नहीं पहुंच सका है।
पैरिस के पास्चर इंस्टीट्यूट में भी एक वैक्सीन पर काम हो रहा है लेकिन वह प्रीक्लिनिकल डेवलपमेंट के स्टेज में है। मगर इसकी अच्छाई यह है कि अगर इसने अपने चरण पूरे कर लिए तो इसकी लाइसेंसिग प्रक्रिया तेज़ी से पूरी हो जाएगी।
इस बीच डब्ल्यूएचओ के सहयोग से भी इस पहलू पर काम हो रहा है कि ट्रायल प्रक्रिया को तेज़ किया जाए और एक साथ कई देशों में टेस्ट हो। एक प्रोपोज़ल यह है कि स्वस्थ लोगों पर ट्रायल किया जाए मगर वैज्ञानिकों की नज़र में यह प्रस्ताव उचित नहीं है।
वैक्सीन तैयार हो जाता है तो एक समस्या यह होगी कि पहले किसको दिया जाए। हर देश इसे पहले हासिल करने की कोशिश करेगा।
यदि अब से एक साल बाद भी कोई वैक्सीन लाइसेंस हासिल कर लेता है तो इसे सब तक पहुंचने में इतना समय ज़रूर लग जाएगा कि वर्तमान महामारी समाप्त हो चुकी होगी। लेकिन फिर भी वह व्यर्थ नहीं जाएगा। क्योंकि यह आशंका है कि कोरोना वायरस हर साल एक ख़ास मौसम में उभरे और दूसरी बात यह है कि यदि किसी अन्य कोरोना वायरस की महामारी फैलती है तो उसमें भी इस वैक्सीन को आज़माया जा सकता है। तो इस समय जिस वैक्सीन पर काम हो रहा है वह शायद महामारी की चपेट में आने वालों को अभी फ़ायदा नहीं पहुंचा सकेगा मगर भविष्य में मानवता को बेहतर अंदाज़ में सुरक्षित बना सकेगा।