3 मार्च 2020 - 16:38
...तो उनकी लाश को भी बांग्लादेश भेज दो, असम स्थित डिटेंशन कैम्पों में मौत का तांडव

पिछले साल अक्तूबर में दिहाड़ी मज़दूर दुर्योधन दास, सीतामढ़ी गांव में काम की तलाश में निकले ही थे कि उनका फ़ोन बजा। उन्हें भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम की राजधानी गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज में आने का निर्देश दिया गया, जहां उनके पिता, 70 वर्षीय फ़ालू दास को “बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति”के कारण भर्ती कराया गया था।

दुरधन दास को क्या पता था कि इस फ़ोन कॉल के 5 दिन बाद ही 24 अक्तूबर 2019 को उनके पिता गोलपारा डिटेंशन कैम्प में अस्पष्ट परिस्थितियों में मरने वाले 28वें क़ैदी बन जायेंगे।

उनकी पत्नी कोरबुला दास का कहना हैः "हमें नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ? भारत सरकार ने मेरे पति को मार डाला।"

फ़ालू बंगाली मूल के एक हिंदू थे। जुलाई 2017 में "विदेशी ट्रिब्यूनल" के सामने अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाने के कारण उन्हें गोलपारा डिटेंशन कैम्प में बंद कर दिया गया था।

असम के 6 डिटेंशन कैम्पों में ऐसे सैकड़ों भारतीय बंद हैं, जो अपनी नागरिकता साबित करने में असफल रहे हैं।

वर्षों तक चलने वाली प्रक्रिया के बाद, अगस्त 2919 में राज्य में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) जारी किया गया, जिसमें फालू समेत बंगाली मूल के लगभग 20 लाख लोगों के नाम नहीं थे। इसमें अधिकांश हिंदू हैं, जबकि मुसलमानों की एक बड़ी संख्या शामिल है।

फ़ालू के परिवार ने उनका शव लेने से इनकार करते हुए अधिकारियों से कहा, 'उनके शव को बांग्लादेश भेज दो'।

फ़ालू की मौत के लिए ज़िम्मेदार इस नौकरशाही प्रक्रिया ने असम में अनगिनत परिवारों को तोड़कर रख दिया है और अब यही प्रक्रिया मोदी सरकार पूरे देश में लागू करने का प्रयास कर रही है।

फ़ालू के छोटे बेटे भागू दास ने अल-जज़ीरा से बात करते हुए कहाः हमने अधिकारियों को उनके नाम के तमाम वैध दस्तावेज़ दिखाए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया। वास्तव में अगर वे एक विदेशी थे तो फिर उनकी लाश भी बांग्लादेश भेजी जानी चाहिए। भारत सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया था, इसलिए कि उसका मानना था कि वे बांग्लादेशी हैं।

डबडबाई आंखों से दास ने कहाः मेरे पिता ने अपने जीवन के आख़िरी दो साल जेल में गुज़ारे, इसलिए कि वह अपनी नागरिकता साबित करने में नाकाम रहे। अब जब उनके अंतिम संस्कार का समय आया तो वे कैसे यह मानकर चल रहे हैं कि हम एक ही परिवार से थे।

फ़ालू ने अपने पीछे एक पत्नी और 6 बच्चे छोड़े हैं। 4 लड़कियां और 2 बेटे। उनकी झोपड़ी सीतामढ़ी में एक मंदिर के निकट है और वे इलाक़े के सबसे ग़रीब परिवारों में से एक हैं।

30 वर्षीय दुर्योधन एक फटी हुई थैली निकालते हैं, जिसमें उनके पिता काग़ज़ रखे हुए थे। उसमें एक वोटर आई कार्ड, बैंक खाता और नालबाड़ी के डिप्टी कमिश्नर के दो पत्र, पहले में उनके बीमार होने और दूसरे में उनकी मौत की सूचना दी गई है।

फ़ालू की मौत के बाद कई दिनों तक नेताओं की खींचतान और मीडिया सर्कस को याद करके परिवार का ग़म दोगुना हो जाता है। उनका कहना है कि अधिकारियों और सत्तारूढ़ हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के के नेताओं ने फ़ालू की लाश को लेने और अंतिम संस्कार के लिए बहुत दबाव डाला। जबकि विपक्षी कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने उन्हें सलाह दी कि जब तक पूरे परिवार को भारतीय नागरिक घोषित नहीं कर दिया जाए, शव को स्वीकार नहीं करें।

दुर्योधन का कहना है कि अपना विरोध ख़त्म करने और शव को स्वीकार करने के बदले बीजेपी नेताओं ने उन्हें नक़दी मुआवज़ा, घर और नौकरी देने का वादा किया।

उनका कहना है कि हम तो ग़रीब लोग हैं, हमारे पास तो अंतिम संस्कार तक के लिए पैसे नहीं हैं। इस पर ज़ुल्म यह कि एनआरसी की अंतिम लिस्ट में केवल मेरी मां और बड़ी दो बहनों के नाम शामिल हैं। मेरा, मेरे भाई का और दो बहनों का नाम लिस्ट में नहीं है।

उनका कहना है कि पिता की मौत को पांच महीने बीत चुके हैं, लेकिन बीजेपी नेताओं ने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया है।

दुर्योधन ने बतायाः बीजेपी नेताओं ने हमसे कहा कि तुम्हें नागरिकता के लिए विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने की ज़रूरत नहीं है। इसलिए कि जब भी नागरिकता का नया क़ानून CAA लागू होगा तो ख़ुद ब ख़ुद तुम्हारे नाम लिस्ट में शामिल हो जायेंगे, इसलिए कि तुम हिंदू हो।