15 फ़रवरी 2020 - 18:32
दाइश का नया बसेराः अमरीका के इशारे पर दाइश ने अफगानिस्तान का रुख किया और अब वह इस युद्ध ग्रस्त क्षेत्र में पैर पसार रहा है!

अफगानिस्तान पर सोवियत संघ ने 70 के दशक के अंतिम वर्षों में हमला किया और इस देश पर क़ब्ज़ा कर लिया।

इस अवैध क़ब्ज़े की वजह से भी क्षेत्र में वहाबी विचारधारा को फलने फूलने में काफी मदद मिली। वहाबियों ने एक इस्लामी देश पर अवैध क़ब्ज़े की बात करके इस देश में अपने सदस्यों और समर्थकों को एकजुट किया। सोवियत संघ को धूल चटाने के लिए अमरीका मैदान में आया और सऊदी अरब व अमरीका के प्रयासों से अफगानिस्तान में तथाकथित जेहाद शुरु हो गया। इस तथाकथित जेहाद के लिए दुनिया के विभिन्न देशों से लोग, अफगानिस्तान पहुंचने लगे और उन सब का मक़सद एक ही था, सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध। यह युद्ध इस्लाम के नाम पर लेकिन अमरीका के हितों की रक्षा के लिए किया जा रहा था। इन सब को वहाबियों की कट्टरपंथी विचारधारा, एक मंच पर लायी थी और इसी देश में कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा परवान चढ़ी और फिर उसामा बिन लादिन के नेतृत्व में अलकायदा जैसा भयानक आतंकवादी संगठन बना और फैलता चला गया। यह संगठन भी इस्लाम के नाम पर बना था लेकिन उसके पीछे अमरीका था। 

अलक़ायदा से तो सब परिचित हैं। वास्तव में अलकायदा की बुनियाद ही, चरमपंथी और वहाबी विचारधारा पर पड़ी है । अलकायदा के सभी सदस्य, वैचारिक दृष्टि से इब्ने तैमिया और मुहम्मद बिन अब्दुलवह्हाब के अनुयाई हैं। इब्ने तैमिया इस्लामी जगत में  चरमपंथ का जनक समझा जाता है और मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब ने, इब्ने तैमिया की विचारधारा पर वहाबियत का ताना बाना बुना। अलकाएदा ने जेहाद का गलत अर्थ निकाल कर विभिन्न देशों में हिंसा की और आतंकवादी हमले किये। अलकायदा के अधिकांश सदस्य पश्चिमी एशिया विशेषकर सऊदी अरब से संबंध रखते हैं। 

सन 2001 में अफगानिस्तान पर अमरीका ने हमला किया। इस हमले का उद्देश्य, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध बताया गया था। इस हमले की वजह से अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार का अंत हो गया और अलकायदा भूमिगत हो गया और उसके बहुत से सदस्य अफगानिस्तान छोड़ कर भाग गये । इस तरह अब अलकाएदा एक प्रकार से अमरीका के लिए लाभहीन हो चुका था और अब किसी नये संगठन की ज़रूरत थी जो अलकाएदा के अभियान को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा सके। 

अमरीका ने सन 2003 में इराक़ पर चढ़ाई कर दी और इस देश पर भी अमरीका ने क़ब्ज़ा कर लिया । अमरीकी कब्ज़े के साथ ही पूरे देश में अराजकता फैल गयी। हर तरफ हंगामा और अशांति थी। इराक़ के इस प्रकार के वातावरण में अमरीका और ब्रिटेन की खुफिया एजेन्सियों ने अपना काम शुरु किया और उनके षडयंत्र के परिणाम में तकफीरी कट्टरपंथी विचारधारा मज़बूत होने लगी और वहाबी तकफीरी संगठनों ने इराक़ की परिस्थितियों से गलत फायदा उठाते हुए हमले शुरु कर दिये। इराक़ में इस प्रकार के आतंकवादी हमले, अबू मुसअब ज़रक़ावी के नेतृत्व में बनने वाले एक गुट ने आरंभ किये। अबू मुसअब ज़रक़ावी ने सब से पहले जमाअतुत्तौहीद नामक एक संगठन बनाया। दिसंबर सन 2004 में बिन लादिन ने अबू मसअब ज़रक़ावी को इराक़ में अलकायदा का प्रतिनिधि घोषित कर दिया और फिर इस देश में हिंसा का तांडव शुरु हो गया। इराक़ की सड़कों, होटलों और बाज़ारों में बम धमाके होने लगे और इराकी जनता बड़ी संख्या में मारी गयी मरने वालों में अधिकांश शिया समुदाय के इराक़ी थे। 

सन 2006 में अबू मुसअब ज़रक़ावी मारा गया और उसके मारे जाने के बाद " मुजाहेदीन परिषद" ने एक बयान जारी करके, तथाकथित " इराक़ की इस्लामी सरकार" अर्थात "आईएसआईएस" के गठन की घोषणा कर दी जिसे अरबी में "दाइश"  कहा जाने लगा।  इस नये संगठन का नेतृत्व अबू उमर अलबगदादी के ज़िम्मे बताया गया। दस्तावेज़ों से पता चलता है कि सद्दाम के समर्थक बास पार्टी के सदस्यों और "दाइश" के आतंकवादियों के मध्य निकट सहयोग था और वह एक दूसरे की खूब मदद करते थे। दाइश ने पूरे इराक़ में मौत का बाज़ार गर्म कर दिया लेकिन अप्रैल सन 2010 में अबू उमर अलबगदादी मारा गया और उसके बाद दाइश का नेतृत्व अबू बक्र अलबगदादी ने संभाला और फिर दुनिया ने हिसां व मौत का वह तांडव देखा जिसकी मिसाल अतीत में नहीं मिलती। 

सन 2013 के आंरभ में  आतंकवादी संगठन, दाइश का गठन हुआ। हालांकि दाइश ने अलकाएदा के कोख से जनम लिया है लेकिन कई आयामों से उसकी कार्यशैली, अलकायदा से बिल्कुल भिन्न है। दाइश, विभिन्न क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करके शासन करने का इरादा रखता है जिसका आरंभ उसने इराक़ और सीरिया से किया था लेकिन प्रतिरोध मोर्चे की वजह से उसे हार का सामना करना पड़ा। इराक़ और सीरिया में हारने के बाद अमरीका के इशारे पर इस भयानक संगठन ने अफगानिस्तान का रुख किया और अब वह इस युद्ध ग्रस्त क्षेत्र में पैर पसार रहा है। दाइश के अस्तित्व में आने के चाहे जितने कारण हों लेकिन यह निश्चित है कि उसका जन्म, अमरीका, सऊदी अरब और इस्राईल के त्रिकोण के प्रयासों से और वहाबियत की कोख से हुआ है। अमरीका की प्रिसंटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बेर नार्ड हेकल इस बारे में कहते हैं कि दाइश, वह वहाबियत है जिसे सधाया न गया हो, वहाबियत, दाइश से सब से अधिक निकट  है और उन दोनों की जड़ें एक हैं तथा हिंसा दोनों की विचारधारा का अभिन्न अंश है।