ज़मीन की लगभग 72 फ़ीसद सतह पानी से ढकी हुयी है। पानी से ढकी सतह का लगभग 97 फ़ीसद पानी खारा है जो पीने के लायक़ नहीं हैं। दुनिया में पीने के लायक़ पानी के 1 फ़ीसद भाग तक ही आसानी से पहुंच हो पाती है। आज स्वच्छ पानी की आपूर्ति का विषय पूरी दुनिया के लिए जीने मरने का विषय हो गया है। नई शैली पर आधारित टेक्नॉलोजी के ज़रिए पानी को शुद्ध करने की कोशिश हो रही है। इन नई शैलियों में एक इलेक्ट्रोडायलिसिज़ की शैली है जिसे संक्षेप में ईडी कहा जाता है।
साल 2016 के नवंबर के शुरु में इस्लामी गणतंत्र ईरान में इलेक्ट्रोडायलिसिज़ टेक्नॉलोजी के ज़रिए पानी के शुद्धिकरण की पहली मशीन का लोकार्पण हुआ। इससे पहले तक यह प्रौद्योगिकी सिर्फ़ अमरीका और इस्राईल के पास थी। ईरान पानी से नाइट्रेट निकालने वाली प्रौद्योगिकी से संपन्नता की दृष्टि से तीसरे नंबर पर है। इस टेक्नॉलोजी की प्राप्ति से पहले तक अंतर्राष्ट्रीय मानदंड से ज़्यादा नाइट्रेट वाले कुओं को बंद कर दिया जाता था या फिर उसके पानी को कम नाइट्रेट वाले पानी से मिला दिया जाता था। लेकिन इस समय इस टेक्नॉलोजी के ज़रिए दूषित पानी को शुद्ध किया जाता है और उसमें मौजूद नुक़सानदेह आयन को, लाभदायक आयन में बिना किसी बदलाव के, ख़त्म कर दिया जाता है। इस टेक्नॉलोजी का प्रायोगिक नमूना बन कर तय्यार है और क्वालिटी की दृष्टि से इसकी पुष्टि हो चुकी है। इस टेक्नॉलोजी के ज़रिए कम ख़र्च और उचित क्वालिटी वाला स्वच्छ पानी हासिल कर सकते हैं। इस टेक्नॉलोजी के ज़रिए पानी में मौजूद नाइट्रेट, आर्सेनिक और अन्य भारी धातु की मात्रा को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।
ईरान की अमीर कबीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नॉलोजी के शोधकर्ता ने माइक्रोस्कोप के नीचे इस्तेमाल होने के लायक़ इन्क्यूबेटर बनाया जिससे कोशिकाओं और कीटाणुओं को मारा जा सके। इस इन्क्यूबेटर के ज़रिए कोशिकाओं पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक टेस्ट किया जा सकता है। कोशिकाओं को उनके प्राकृतिक वातावरण से बाहर रखने के लिए विशेष स्थिति का होना ज़रूरी है क्योंकि कोशिकाएं अपने स्वाभाविक वातावरण से बाहर की दुनिया में ज़्यादा दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। इस तंत्र की प्रयोगशालाओं में बहुत अधिक उपयोगिता है। इंसान की कोशिकाओं के नमूनों को रेडियो वेव के नीचे रख कर कोशिकाओं पर तरंगों के असर की जांच की जा सकती है। इस तंत्र की एक विशेषता यह है कि इस तंत्र को बनाने में विदेशी नमूनों की तुलना में कम लागत आती है।
अमीर कबीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नॉलोजी के शोधकर्ताओं ने क्लाउड सिस्टम में इंरटनेट यूज़र्स के निजी डाटा की रक्षा व संचालन के लिए विशेष शैली पेश की है। ये डाटा साइबर हमले की वजह से बदल जाते थे। चूंकि कुछ ऐप या कुछ यूज़र्स की वजह से जिन्हें इस तरह के सिस्टम तक पहुंचने की इजाज़त होती है, इस तरह की घटना घटती है। अमीर कबीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नॉलोजी के शोधकर्ताओं ने क्लाउड सिस्टम के यूज़र्स के लिए "के अननिमिटी" शैली का इस्तेमाल किया है।
मैन्चेस्टर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता इंसान के दिमाग़ की आम इलेक्ट्रिक तरंग में जिसे अल्फ़ा वेव कहते हैं, पहली बार अपना कौशल दिखाने में सफल हुए जिसके नतीजे में विभिन्न मुश्किलों और ऑप्रेशन से होने वाले दर्द का अनुभव कम हो जाता है। इस काम के लिए अल्फ़ा वेव की पहुंच और फ़्रिक्वेन्सी में साइमुलेटिड साउंड को हेडफ़ोन के ज़रिए इंसान के कान में पहुंचाते हैं। यह रोमांचकारी नया इलाज बहुत सादा, सुरक्षित और कम ख़र्च वाला है। निकट भविष्य में इलाज की यह शैली सबके लिए आम हो जाएगी।
अमीर कबीर यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नॉलोजी, के शोधकर्ताओं ने कोलाजेन, हयालोरॉनिक एसिड, काइटोज़ाएन, मिलेट और शहद से कृत्रिम त्वचा बनायी। इस त्वचा को घाव के ऊपर सात दिन लगाने से घाव भर जाता था। इस त्वचा को ऊतकों की मरम्मत के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस शोध में इस्तेमाल हुए कोलाजेन को चूहे और हयालोरॉनिक एसिड को नाभि के ख़ून से लिया गया।