30 दिसंबर 2019 - 15:13
आयत क्या कहती हैं? ईश्वर के पैग़म्बरों व प्रिय बंदों का क्रोध, ईश्वर के क्रोध का भी कारण बनता है।

उन्होंने लोगों से वचन लिया था कि वे उनकी अनुपस्थिति में हज़रत हारून अलैहिस्सलाम का अनुसरण करें तथा उनके आदेशों का उल्लंघन न करें।

सूरए ताहा की आयत क्रमांक 86 का अनुवादः

तो मूसा अत्यन्त क्रोध और दुख में डूबे हुए अपनी जाति (के लोगों) की ओर पलटे (और उनसे) कहाः हे मेरी जाति (के लोगो)! क्या तुम्हें तुम्हारे पालनहार ने (तौरैत भेजने के संबंध में) अच्छा वचन नहीं दिया था? तो क्या तुम पर (उस वचन के पूरे होने की) अवधि बहुत लम्बी गुज़री या तुमने यही चाहा कि तुम पर तुम्हारे पालनहार का प्रकोप टूट पड़े कि तुमने मुझे दिए हुए वचन को तोड़ दिया।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

बनी इस्राईल ने अपने इस वचन को तोड़ दिया और हज़रत हारून की बातों पर तनिक भी ध्यान न दिया। यही कारण था कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत से वापस लौटे तो तौरैत मिलने के कारण प्रसन्न होने के स्थान पर क्रुद्ध व दुखी थे।

 

इस आयत से मिलने वाले पाठ:

  1. कुफ़्र व पथभ्रष्टता के मुक़ाबले में धार्मिक आवेश के कारण क्रोध व दुख, ईश्वर के प्रिय बंदों की विशेषताओं में से है।
  2. ईश्वर के पैग़म्बरों व प्रिय बंदों का क्रोध, ईश्वर के क्रोध का भी कारण बनता है।

  3. ईश्वर से की गई प्रतिज्ञाओं का उल्लंघन, समाज में पथभ्रष्टता व रुढ़िवाद का मार्ग प्रशस्त करता है।