सूरए ताहा की आयत क्रमांक 74, 75 और 76 का अनुवादः
निश्चित रूप से जो कोई अपने पालनहार के पास अपराधी बनकर आए तो उसके लिए नरक है जिसमें न तो वह मरेगा और न जीवित रहेगा। और जो कोई उसके पास मोमिन होकर आए और उसने भले कर्म किए हों तो ऐसे ही लोगों के लिए तो ऊँचे दर्जें हैं। उनके लिए (स्वर्ग के) अमर बाग़ हैं, जिनके नीचें से नहरें बहती होंगी, उनमें वे सदैव रहेंगे। यह पारितोषिक है उसका जिसने स्वयं को (पापों से) पवित्र रखा।
संक्षिप्त टिप्पणी:
जो कोई ईमान लाए और भले कर्म करे तो उसे ईश्वर के निकट, सबसे ऊंचे दर्जे प्राप्त होंगे और वह स्वर्ग की अनंत अनुकंपाओं से लाभान्वित होगा।
इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
- मनुष्य का अपना संकल्प और इच्छा शक्ति होती है और वह जिस क्षण भी चाहे ईमान से कुफ़्र की ओर या कुफ़्र से ईमान की ओर जा सकता है।
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मनुष्य का अंत महत्वपूर्ण होता है, बहुत से लोग ऐसे हैं जो लम्बे समय से काफ़िर हैं किंतु अपनी आयु के अंत में ईमान के साथ इस संसार से जाते हैं और कितने ऐसे लोग होते हैं जो लम्बे समय तक ईश्वर की उपासना करते रहते हैं किंतु कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के साथ, इस संसार से जाते हैं।
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ईश्वर का भय और आत्मनिर्माण, लोक-परलोक में कल्याण व मोक्ष का मार्ग है।
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हृदय, आंखों और ज़बान की पवित्रता मनुष्य को हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखती है और ईश्वरीय स्वर्ग तक पहुंचाती है।