30 नवंबर 2019 - 16:33
आयत क्या कहती है? यदि धरती में मनुष्य का आरंभ व अंत मिट्टी से है तो फिर इतना घमंड व अहंकार किस लिए?

यही धरती जो तुम्हारे जीवन और प्रगति का स्रोत है, तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारे शरीर को अमानत स्वरूप ले लेगी और प्रलय में वापस कर देगी।

सूरए ताहा की आयत क्रमांक 55वीं का अनुवादः

हमने मिट्टी से ही तुम्हारी रचना की है और उसी में तुम्हें लौटाएंगे और एक बार फिर तुम्हें मिट्टी से बाहर निकालेंगे।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

पहले सजदे का अर्थ यह है कि ईश्वर मैं आरंभ में मिट्टी से था, व्यक्ति जब सजदे से सिर उठाता है तो इस बात की ओर संकेत होता है कि प्रभुवर तू ने मिट्टी से मेरी रचना की है। दूसरे सजदे का अर्थ होता है प्रभुवरः तू मुझे पुनः मिट्टी में लौटाएगा जबकि जब दूसरे सजदे से सिर उठाता है तो मानो वह ईश्वर से कह रहा होता है कि तू प्रलय में मुझे पुनः मिट्टी से बाहर निकालेगा।

 

इस आयत से मिलने वाले पाठ:

  1. यदि धरती में मनुष्य का आरंभ व अंत मिट्टी से है तो फिर इतना घमंड व अहंकार किस लिए?

  2. मृत्यु, जीवन का अंत नहीं है, धरती हमारे शरीरों को प्रलय तक के लिए अमानत के रूप में सुरक्षित रखेगी।