सूरए ताहा की आयत क्रमांक 47 और 48 का अनुवादः
अतः (बिना भय के) उसके पास जाओ और कहो कि हम तेरे पालनहार के पैग़म्बर हैं। तो बनी इस्राईल को हमारे साथ भेज दे और उन्हें यातना न दे। निश्चित रूप से हम तेरे पास तेरे पालनहार की निशानी लेकर आए है और शांति है उसके लिए जो मार्गदर्शन (को स्वीकार करके उस) का अनुसरण करे। निश्चित रूप से हमारे पास ईश्वरीय संदेश आया है कि (ईश्वरीय निशानियों को) झुठलाने और उनकी ओर से मुंह फेरने वालों के लिए निश्चय ही (कड़ा) दंड है।
संक्षिप्त टिप्पणी:
सत्य को स्वीकार करने की स्थिति में ईश्वरीय दया की प्राप्ति का प्रोत्साहन और सत्य को झुठलाने और उससे मुंह मोड़ने की स्थिति में ईश्वरीय कोप और दंड की धमकी।
इस आयत से मिलने वाले पाठ:
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धर्म के प्रचार और उपदेश में सर्वप्रथम बड़े व प्रतिष्ठित लोगों को दृष्टिगत रखना चाहिए क्योंकि समाज का सुधार उसके नेताओं के सुधार पर निर्भर होता है।
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अत्याचारी शासकों से मुक़ाबला और लोगों की स्वतंत्रता, पैग़म्बरों के दायित्वों में सर्वोपरि है।
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व्यक्ति व समाज की शांति व सुरक्षा, ईश्वरीय शिक्षाओं को लागू करने में है तथा इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य मार्ग का चयन, संसार में संकटों व समस्याओं तथा परलोक में ईश्वरीय दंड व कोप का कारण बनेगा।