13 नवंबर 2019 - 11:31
आयत क्या कहती है? हज़रत मूसा व हारून का ऐसा ही ईमान व विश्वास था अतः ईश्वर ने भी उनकी प्रार्थनाओं को पूरा किया।

अनन्य ईश्वर पर लोगों के ध्यान और अनेकेश्वरवाद तथा अत्यचार से दूरी के अतिरिक्त उनका कोई उद्देश्य नहीं था।

सूरए ताहा की आयत क्रमांक 33, 34, 35 और 36 का अनुवादः

ताकि (हे ईश्वर!) हम तुझे (हर प्रकार के समकक्ष से) बहुत विरक्त मानें। और तुझे बहुत अधिक याद करें। निश्चित रूप से तू हमारे बारे में अधिक (जानकार व) देखने वाला है। ईश्वर ने कहा हे मूसा! निश्चित रूप से तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई।

 

संक्षिप्त टिप्पणी:

ईश्वर का गुणगान करना और उसे समकक्ष सहित हर प्रकार की बुराई से दूर बताना हर एक के लिए संभव है किंतु इन बातों को समाज में व्यवहारिक बनाना और अनेकेश्वरवादी व्यवस्थाओं को समाप्त करना पैग़म्बरों का काम है और वह भी ईश्वर की सहायता और उसकी दया व कृपा से।

 

इस आयत से मिलने वाले पाठ:

  1. पैग़म्बरों की दृष्टि में सत्ता का लक्ष्य अनेकेश्वरवादी व्यवस्था को समाप्त और एकेश्वरवादी व्यवस्था को स्थापित करना है।
  2. यद्यपि ईश्वर हर वस्तु और हर बात को जानता व देखता है किंतु फिर भी प्रार्थना करना हमारा दायित्व है।