16 अक्टूबर 2019 - 13:29
सऊदी अरब, ईरान के साथ संबंध बेहतर करने की इच्छा, सच्ची या रणनीति ? एक विश्लेषण

हालिया दिनों में सऊदी अरब ने जिस तरह से ईरान की ओर हाथ बढ़ाया और ईरान से हाथ मिलाने के लिए जिस प्रकार से कई नेताओं और देशों से मदद की अपील की उससे यह उम्मीद पैदा हो गयी है कि मध्य पूर्व के दो शक्तिशाली देशों के मध्य जारी गैर सार्थक प्रतिस्पर्धा शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी किंतु जो हालात बन रहे हैं उनमें ईरान के साथ संबंध सामान्य बनाने की सऊदी कोशिशों को कुछ गलियारों में संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।

ईरान हमेशा की तरह सऊदी अरब की ओर से आने वाले अच्छे संकेतों का स्वागत कर रहा है। सऊदी अरब की ओर से एक अच्छा संकेत, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से सऊदी क्राउन प्रिंस की यह मांग की कि वह ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी से उनकी भेंट कराएं। बिन सलमान ने इसी प्रकार की मांग, इराक़ी प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल मेहदी से भी की थी।

     यह सब तो संदेश और ज़बानी बातें हैं किंतु व्यवहारिक रूप से यह नज़र आया कि संयुक्त राष्ट्र संघ में सऊदी प्रतिनिधिमंडल ने ईरान के खिलाफ विरोध व आलोचना पर आधारित रुख अपनाया और सऊदी क्राउन प्रिंस के छोटे भाई खालिद बिन सलमान ने जो इस समय सऊदी अरब के उप रक्षा मंत्री हैं, ट्रम्प सरकार के कट्टरपंथियों से भेंट की जिसके परिणाम स्वरूप 3000 अतिरिक्त अमरीकी सैनिक सऊदी अरब भेजे गये और दोनों देशों के मध्य हथियारों का नया सौदा हुआ।

     इसी तरह ईरान व सऊदी अरब में मध्यस्थता के लिए सऊदी अरब की यात्रा और सऊदी नेताओं से बातचीत के बाद जब वह इराक़ वापस लौटे तो वहां शिया बाहुल्य प्रांतों में व्याशिया बाहुल्य प्रातस्थता के लिए सऊदी अरब की यात्रा और सऊदी नेताओं से बातचीत के बाद जब वह इराक़ वापस लौटे तो वहां शिपक रूप से प्रदर्शन आरंभ हो गये और इस बात के सुबूत मिले कि प्रदर्शनकारियों को भड़काने में सऊदी अरब की मुख्य भूमिका है। इन सब से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सऊदी अरब के जद्दा नगर के तट से मात्र 75 किलोमीटर की दूरी पर समुद्र में एक ईरानी आयाल टैंकर पर हमला किया गया।

सवाल यह है कि सऊदी अरब की नीतियों में इस प्रकार के दोहरेपन का क्या अर्थ है?

     इस सवाल का जवाब दो प्रकार से तलाश किया जा सकता है। पहले चरण में तो यह समझा जा सकता है कि बिन सलमान के नेतृत्व में सऊदी अरब को पिछले कई बरसों के अनुभव से अब यह पता चल गया है कि उनकी नीतियों में बदलाव की ज़रूरत है लेकिन इस्राईल के कट्टरपंथी और अमरीका में ट्रम्प की सरकार इस प्रकार के किसी भी बदलाव का कड़ा विरोध कर रही है।

     दूसरी दशा में यह समझ जा सकता है कि सऊदी अरब की सरकार यथावत अपने पिछले रुख पर बाक़ी है लेकिन ट्रम्प और इसी प्रकार इस्राईल को अपने साथ अधिक सहयोग पर तैयार करने के लिए एक सोची समझी रणनीति के तहत ईरान के साथ तनाव कम करने की इच्छा प्रकट कर रही है। बहरहाल इन दोनों संभावनाओं में से कौन सी संभावना सही है इसका पता तो अगले कुछ दिनों में होने वाली घटनाओं से चलेगा लेकिन यह विचार की सऊदी अरब यह सब कुछ एक रणनीति के तहत कर रहा है अधिक मज़बूत लगता है और अगर यह विचार सही हुआ तो फिर  इसका मतलब यह है कि बिन समान ने पाकिस्तान और इराक़ के प्रधानमंत्रियों का भी मज़ाक बना दिया है।