सूरए रूम की आयत क्रमांक 40 का अनुवादः
वह ईश्वर ही है जिसने तुम्हारी रचना की, फिर तुम्हें रोज़ी दी, फिर वह तुम्हें मृत्यु देता है (और) फिर वही तुम्हें जीवित करेगा। तुम्हारे द्वारा ठहराए गए ईश्वर के समकक्षों में भी क्या कोई ऐसा है जो इन कामों में से कुछ कर सके? जो कुछ वे उसका समकक्ष ठहराते हैं वह उससे पवित्र व महान है।
संक्षिप्त टिप्पणी:
जिन चीज़ों की वे उपासना करते हैं उनकी उनके जीवन व मृत्यु में कोई भूमिका नहीं है और वे केवल अपने पूर्वजों के अंधे अनुसरण में इस प्रकार की निर्जीव वस्तुओं को पवित्र समझ कर उनकी उपासना करते हैं।
इस आयत से मिलने वाले पाठ:
- हमारा अतीत, वर्तमान व भविष्य और आजीविका ईश्वर के हाथ में है।
- अतः हमें केवल उसी का दास बन कर रहना चाहिए और किसी को उसका समकक्ष नहीं ठहराना चाहिए।
- प्राकृतिक क़ानूनों व साधनों को ईश्वर के समान नहीं बल्कि उसकी रचना समझना चाहिए।
- ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी शक्ति के पास अपनी व्यक्तिगत स्वाधीनता नहीं है और वे छोटे से छोटे जीव की रचना में भी अक्षम है।