इन लक्ष्यों में से एक नए इस्लामी शासन को उखाड़ फेंकना और ईरान के कुछ भागों पर क़ब्ज़ा करना था। लेकिन ईरानी राष्ट्र के दुश्मनों का यह सपना पूरा नहीं हो सका और युद्ध का अंजाम कुछ दूसरा ही हुआ।
आठ वर्ष तक जारी रहने वाले ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान राष्ट्रीय एकता और प्रेम ने युवाओं में प्रेरणा भर दी और वे पूरे साहस के साथ दुश्मन के सामने डट गए और किसी भी शक्ति से नहीं डरे। इस युद्ध में इराक़ के पूर्व तानाशाह सद्दाम को क़रीब पूरी दुनिया का समर्थन हासिल था और विश्व की बड़ी ताक़तों ने उसे सामूहिक जनसंहार और रासायनिक हथियार दिए थे। ईरान के शहरों पर सद्दाम ने मिसाइल बरसाए और हज़ारों निर्दोष लोगों की जानें गईं। लेकिन आख़िरकार दुश्मन को ईरान की सीमा से बाहर निकाल कर फेंक दिया गया।
इस आठ वर्षीय युद्ध के दौरान ईरानी जनता एकता और एकजुटता के साथ दुश्मन के मुक़ाबले में डट गई और उसने क़ुर्बानी और बलिदान की नई दास्तान लिख दी। लड़ाई के मोर्चे पर जनप्रतिरोध का होना और मोर्चे के पीछे जनशक्ति इस युद्ध में ईरान की सफलता के दो प्रमुख कारण थे। परिणाम स्वरूप प्रतिरोधियों ने ख़ुर्रमशहर की आज़ादी जैसा मूल्यवान इतिहास रच दिया।
फ्रांसीसी अख़बार लिब्रेशन ने इस बारे में लिखा है, ईरानियों द्वारा ख़ुर्रमशहर पर फिर से निंयत्रण हासिल करने के बाद, तुरंत अमरीका, यूरोपीय देशो और फ़ार्स खाड़ी के कुछ देशों ने इस युद्ध की समाप्ति के लिए प्रयास किए ताकि इस तरह से सद्दाम के पतन को रोक सकें। ईरानी राष्ट्र के दुश्मन की हार और इराक़ के भीतर तक उसका पीछा करने से, सद्दाम और उसके समर्थकों के सभी समीकरण उलट पलट गए।
सद्दाम शासन के समर्थक जैसे कि अमरीका, सऊदी अरब और कुवैत ने इराक़ की आर्थिक मदद की और हथियार दिए, जिससे इराक़ क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली देश बन गया, लेकिन सद्दाम इस युद्ध से जो हासिल करना चाहता था वह कभी उसके हाथ नहीं लगा। फ़ार्स खाड़ी में जहाज़रानी की सुरक्षा को ख़तरा होने और तेल की आपूर्ति की रक्षा के बहाने तथा कुवैती तेल टैंकरों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए वह इस देश के निमंत्रण पर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को सही ठहराने लगा, जिसके बाद उसने अपने बड़े युद्धपोत फ़ार्स खाड़ी में तैनात कर दिए। इसके अलावा, अमरीका ने सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों समेत बड़ी शक्तियों को इस युद्ध में घसीट लिया, ताकि उसे एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाकर विश्व स्तर पर ईरान पर दबाव बढ़ा सके और युद्ध का अंत हमलावर के पक्ष में कर दे, लेकिन अंततः वह अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्यों तक नहीं पहुंच सका।
इस परिदृश्य से ईरान-इराक़ युद्ध ईरानी राष्ट्र और आज की और आने वाली नस्लों के लिए एक मूल्यवान और बाक़ी रहने वाला अनुभव है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता और ईरानी सशस्त्र बलों के चीफ़ कमांडर सशस्त्र बलों के कमांडरों से मुलाक़ात में कहते हैं, ईरान की सशस्त्र सेनाओं को वैचारिक, व्यवहारिक, संकल्प और इरादे की दृष्टि से बेहतरीन बलों की ज़रूरत है, ताकि ईरानी राष्ट्र की शक्ति की दुश्मनों के मुक़ाबले में रक्षा कर सकें।
ईरान के रक्षा मंत्री ब्रिगेडियर जनरल अमीर हातेमी इस बारे में कहते हैं, जब तक कि कुछ लोग धमकी भरे लहजे में ईरान से बात करते रहेंगे, ईरान की रक्षात्मक शक्ति को पूरी ताक़त से मज़बूत बनाया जाता रहेगा। किसी भी देश की रक्षात्मक शक्ति दुश्मनों के ख़तरे के मुक़ाबले के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और हथियारों के क्षेत्र में कोई भी कमज़ोरी ऐसा नुक़सान पहुंचा सकती है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती।
जैसा कि वरिष्ठ नेता ने उल्लेख किया है कि ईरान-इराक़ युद्ध के अनुभव एक ख़ज़ाना है। दुश्मन इसे भुला देना चाहता है, लेकिन ईरान के विकास और विभिन्न क्षेत्रों में ईरानी जवानों की प्रगति के लिए इसे ज़िंदा रखना ज़रूरी है। ईरान की रणनीति तनाव और युद्ध से बचने की है, लेकिन हमलावरों और आक्रमणकारियों के लिए उसका हमेशा ही यह संदेश रहा है कि ज़रूरत पड़ने पर न वह केवल अपनी रक्षा करेगा, बल्कि उसके पास इतनी क्षमता है कि क्षेत्र की शांति को भंग करने वाले तत्वों से निपट सके।
ईरान की वायु रक्षा प्रणाली के बारे में एलीजाह जी मानिया लिखते हैं कि कैसे 2500 डॉलर की लागत से तैयार होने वाले ईरानी मिसाइलों ने अमरीकी नौसेना के आधुनिक ग्लोबल हॉक आरक्यू-4 ड्रोन का पता लगाकर उसे मार गिराया, जिसे 12 करोड़ 30 लाख डॉलर की लागत से तैयार किया गया था। ...
नेश्नल इंटरेस्ट पत्रिका ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अमरीकी ड्रोन मार गिराए जाने के बाद ट्रम्प ने दावा किया था कि उन्होंने ईरान पर हमला करने का फ़ैसला कर लिया था, लेकिन कुछ ही देर बाद उसे रद्द कर दिया, उसके बाद ईरानियों को धमकी दी कि हमले का विकल्प मेज़ पर भरपूर संभावना के साथ मौजूद है। लेकिन अगर अमरीका, ईरान के ख़िलाफ़ हमला करता है तो वह इस देश में ज़मीन पर अपने सैनिक नहीं उतारेगा, बल्कि इस युद्ध में वायु और समुद्री शक्ति का इस्तेमाल केरगा। मानो उन्हें अपनी सफलता में किसी तरह का कोई संदेह नहीं था। यह युद्ध ज़्यादा लम्बा नहीं खिंचेगा बल्कि ईरान को मिटा दिया जाएगा।
यहां यह सवाल है कि जब अमरीकी राष्ट्रपति को अपनी सफलता का इतना यक़ीन था तो उन्होंने अपने सबसे बड़े दुश्मन पर हमला क्यों नहीं किया?
आईआरजीसी की क़ुद्स ब्रगेड के कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी ने ट्रम्प की धमकियों का जवाब देते हुए कहा, ईरान के साथ जंग की शुरूआत का अर्थ, अमरीका की सभी सुविधाओं का विनाश है, और जिस जंग को अमरीका शुरू करेगा, उसके अंजाम की स्क्रिप्ट ईरान तैयार करेगा। ... अमरीका ने एक लाख दस हज़ार सैनिकों, हज़ारों टैंकों, सैन्य उपकरणों, सैकड़ों लड़ाकू विमानों और आधुनिक हेलिकॉप्टरों से तालिबान जैसे कम सुविधा प्राप्त और एक कमज़ोर संगठन पर हमला किया तो भी कुछ हासिल नहीं कर सका।
जनरल सुलेमानी ने हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ इस्राईल के 33 दिवसीय युद्ध में ज़ायोनी शासन और अमरीका की हार और यमन युद्ध में सऊदी अरब और इमारात का समर्थन करने का उल्लेख करते हुए कहा, अमरीका ऐसी हालत में ईरान को धमकी दे रहा है कि उसने लाल सागर को अशांत कर दिया है और सऊदी अरब जो वर्षों से एक शांत देश था, उसे युद्ध की भीषण आग में फंसा दिया है। ट्रम्प को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, आईआरजीसी अकेले तुमसे टक्कर लेने के लिए काफ़ी है, ईरान की बाक़ी सशस्त्र सेनाओं को लड़ाई में शामिल होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। जहां तुम सोच भी नहीं सकते वहां हम मौजूद हैं, इसलिए कि ईरान शहीदों का देश है और उसने काफ़ी कठिन समय गुज़ारा है।
यहां यह बात ग़ौरतलब है कि ईरान अपनी सुरक्षा में किसी तरह के तकल्लुफ़ से काम नहीं लेता है, इसीलिए उसने ख़तरों के हिसाब से अपनी रक्षात्मक शक्ति बढ़ा ली है। ईरान के रक्षा मंत्री इस संदर्भ में कहते हैं, निश्चित तौर पर ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध, दबाव और मानसिक युद्ध जितना अधिक और व्यापक होगा, उतना ही हर क्षेत्र में अपनी रक्षात्मक शक्ति बढ़ाने का हमारा इरादा मज़बूत होगा। ईरान की रक्षात्मक रणनीति प्रभावशाली रक्षा पर आधारित है और हर ख़तरे का भरपूर जवाब देगा।
वरिष्ठ नेता ने अपने बयानों में बार बार ईरान की संप्रभुता के महत्व पर बल दिया है कि इस्लामी व्यवस्था की रक्षात्मक शक्ति का उद्देश्य दुनिया के बड़बोली शक्तियों को ईरान पर हमला करने का विचार करने से रोकना है। दुश्मनों को समझ लेना चाहिए कि अगर उन्होंने ईरान पर हमला करने का विचार किया तो उन्हें बहुत ही कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ेगा, इसलिए कि संभव है वे शुरू करें, लेकिन उसका अंत उनके हाथ में नहीं होगा।
इस वास्तविकता के मद्देनज़र, ईरान-इराक़ युद्ध को ख़तरों के मुक़ाबले में ईरानी राष्ट्र की शक्ति और योग्यताओं के उजागर होने का दौर समझा जाना चाहिए। ईरान आज भी उसी आत्मविश्वास के साथ और पूरी तैयारी से दुश्मन के सामने डटा हुआ है और वह इस मार्ग पर पूरे गर्व के साथ अग्रसर रहेगा।