खैमागाह से कुछ सौ मीटर की दूरी पर इमाम हुसैन और उनके बेटे हज़रत अली अकबर और उनके दोस्त हबीब इब्ने मज़ाहिर का मज़ार है। इस मज़ार में वह कर्बला की वह तराई भी शामिल हैं जहां इमाम हुसैन का सिर तन से जुदा किया गया था। मामला यह है कि कुछ साल पहले यह तय किया गया कि खैमागाह में एक नया प्रांगण बनाया जाए जिसका नाम ज़ैनब रखा गया था।
भूमिगत हॉल
जिस इलाके में यह हॉल बनाने की बात हो रही थी वहां आबादी बेहद घनी है और ज़मीन की क़ीमत बहुत ज़्यादा है इस लिए बहुत सोच विचार के बाद यह फैसला किया गया कि खैमागाह में जो " ज़ैनब हॉल " ज़मीन के भीतर बनाया जाए। इसके लिए खैमागाह की खुदाई होना थी। यह वही जगह थी जहां 1335 साल बाद खुदाई होना थी।
खुदाई शुरु हुई योजना के अनुसार 28 मीटर गहराई तक खुदाई होनी थी। यह खुदाई उस जगह पर हो रही थी जो खैमागाह और इमाम हुसैन के कत्ल किये जाने की जगह के बीच में स्थित है।
जब जंग का असर नज़र आया!
ज़मीन कई परतों में होती है और खुदाई में एक- एक परत हटाई जाती है। कर्बला में इस जगह जब 8 मीटर खुदाई हो चुकी तो कुछ चीज़ें नज़र आयीं जिनसे पता चलता था कि कर्बला की जंग के समय यह परत सब से ऊपर थी। यानि जब खुदाई आठ मीटर तक पहुंची तो वह ज़मीन नज़र आयी जिस पर 1335 साल पहले सन 61 हिजरी क़मरी में कर्बला की लड़ाई हुई थी।
8 मीटर से आगे न बढ़ना!
कर्बला के शहीदों की कब़्रे भी इतनी ही गहराई पर हैं। यही वजह है कि जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलमा के रौज़े के गुंबद को मज़बूत करने का काम शुरु किया गया और उसके लिए खुदाई आरंभ हुई तो इंजीनियरों से कह दिया गया था कि खुदाई 8 मीटर से अधिक न की जाए। 8 मीटर के बाद कर्बला के शहीदों की लाशें दफ्न हैं।
हक़ीक़त के निशान!
खुदाई के बाद यह अफवाह उड़ गयी कि खुदाई के दौरान कर्बला की लड़ाई से संबंधित कुछ चीज़ें भी मिली हैं हालांकि ऐसा नहीं था क्योंकि इतनी गहराई में धातु की कोई चीज़ बची नहीं रहती बल्कि वह फास्फेट में बदल जाती है। इस खुदाई में फास्फेट और ऑक्साइड के चिन्ह मिले हैं जिनका अध्ययन से पता चला कि वह चौहद सौ साल पहले, कर्बला की लड़ाई में इस्तेमाल होने वाले हथियार हो सकते हैं। खुदाई में आशूरा में इस्तेमाल होने वाले भालों, तलवार और ढाल के निशान मिले हैं। इसके साथ ही मिट्टी के बर्तन भी मिले लेकिन यह साबित नहीं है कि वह आशूर में ही इस्तेमाल होने वाले बर्तन थे।
एक गुंबद की अजीब चीज़ें!
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के रौज़े का वर्तमान गुंबद सौ साल से कुछ अधिक समय पहले बनाया गया। एक हज़ार टन का यह ईंटों से बना गुंबद इमाम हुसैन की क़ब्र के चारों तरफ बनी इमारत के मुख्य खंभों पर टिका हुआ है। उस दौर के शिल्पकारों ने भूकंप आदि से बचाने के लिए गुंबद और खंभों के बीच खाली जगह को सागौन की लकड़ी से भर दिया था ताकि भूकंप जैसी किसी स्थिति में गुंबद का सारा बोझ, ईंट के खंभों पर न पड़े और यह लकड़ी एक सहारा रहे लेकिन जब गुंबद की ऊंचाई को बढ़ाने की बात हुई तो गुंबद जिन खंभों पर टिका था उन्हें अधिक मज़बूत करना ज़रूरी हो गया और जब यह काम शुरु किया गया तो एक और आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया। सौ साल पहले गुंबद को सहारा देने के लिए जिन लकड़ियों का प्रयोग किया गया था उन सब में दीमक लग चुकी थीं और वह पावडर बन चुकी थीं। एक हज़ार टन भारी गुंबद, इन्ही लकड़ियों पर टिका हुआ था। जहां तक यह सवाल कि एक हज़ार टन भारी यह गुंबद अब तक गिरा क्यों नहीं था? तो उसका जवाब अभी तक कोई दे नहीं पाया है। फिलहाल लकड़ी के पावडर की जगह लोहे की छड़ का जाल बिछा दिया गया है जहां बाद में कंकरीट डाल दी जाएगी ताकि उस न नये खंभे खड़े किये जा सकें। नया कंकरीट से बना गुंबद कुछ महीनों में पुराने गुंबद की जगह ले लेगा।