यह तो सभी को मालूम है कि ब्रिटेन ने आयल टैंकरों का युद्ध इस लिए छेड़ा ताकि अमरीका को फार्स की खाड़ी में ईरान के खिलाफ गठबंधन बनाने का मौक़ा मिल जाए लेकिन ब्रिटेन की इस सेवा के बाद अमरीका अचानक किनारे हट गया और साफ कह दिया कि फार्स की खाड़ी में ब्रिटेन को अपने जहाज़ों की रक्षा स्वंय करना चाहिए।
यह तो पूरी तरह से स्पष्ट है कि यह सारा विवाद केवल इस लिए है कि फार्स की खाड़ी में हंगामा हो और कई देश अपने अपने सैनिक इस क्षेत्र में भेजने पर तैयार हो जाएं लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हालिया दिनों में जो बयान दिया है वह विचारयोग्य है।
ट्रम्प ने कहा कि अमरीका वर्षों से हुरमुज़ स्ट्रेट से आने जाने वाली जहाज़ों की रक्षा करता है जबकि मालदार चीन और जापान और इसी प्रकार क्षेत्र के अरब देश इस जलमार्ग से लाभ उठाते हैं लेकिन कुछ खर्च नहीं करते। उन्होंने कहा कि अमरीका अब स्वंय ही तेल निर्यात करने वाला देश है और उसे तेल आयात करने की ज़रूरत ही नहीं है जो उसके लिए वह हुरमुज़ स्ट्रेट की सुरक्षा पर मेहनत करे। ट्रम्प के बयान का साफ अर्थ यह है कि अगर कोई यह चाहता है कि अमरीका हुरमुज़ स्ट्रेट में सक्रिय रहे तो फिर उसे चाहिए कि उसका खर्च भी उठाए। ट्रम्प इस तरह से दूसरे देशों पर दबाव डाल कर रक़म एंठना चाहते हैं लेकिन उन्हें यह याद नहीं आता कि फार्स की खाड़ी की सारी समस्याओं की जड़ अमरीका की उपस्थिति है अगर अमरीका इस इलाक़े में न हो तो कोई समस्या ही नहीं होगी। अमरीका खुद ही समस्या पैदा करता है और फिर उस समस्या के निवारण के बहाने दूसरों से रक़म वसूल करना चाहता है। अमरीका पंद्रह हज़ार किलोमीटर से दूर से इस इलाक़े में आया है ताकि अपने हितों की रक्षा कर सके और इसे अमरीकी अधिकारी छुपाते भी नहीं और वह बार बार कहते हैं कि फार्स की खाड़ी में अमरीकी सैनिक, अमरीकी हितों की रक्षा के लिए उपस्थित हैं।
अमरीका का राष्ट्रपति बनने से बहुत पहले, किसी समय ट्रम्प ने कहा था कि अगर वह कभी अमरीका के राष्ट्रपति बने तो फार्स की खाड़ी के अरब देशों के ख़ज़ाने पर झाड़ू फेर देंगे और वह यही कर रहे हैं। अरब शासक भी ट्रम्प को खुश करने के लिए इतना चढ़ावा चढ़ा चुके हैं कि अब उनके मुंह को खून लग गया है और अब वह " डू मोर" का जप कर रहे हैं।
रोचक बात यह है कि अमरीका को " दूधारी गाय " को दूहते देख कर युरोपीय देशों की भी राल टपक रही है और वह भी हाथ आज़मा कर फार्स की खाड़ी के अरब देशों की दौलत में अपना " हिस्सा" चाह रहे हैं। टीकाकारों का यही मानना है कि यह जो ब्रिटेन ने आयल टैंकरों का खड़ांग फैलाया है उसका अस्ल मक़सद भी यही है कि वह ब्रिटेन भी अमरीका की तरह , क्षेत्र के अरब देशों से कुछ " चढ़ावा" चाह रहा है ताकि " आशीर्वाद" दे सके भले ही ज़बरदस्ती। लेकिन जहां तक आशीर्वाद की बात है तो ब्रिटेन या अमरीका में इतना साहस नहीं है कि वह ईरान के खिलाफ एक गोली भी चला सकें जैसा कि सब ने देखा कि जब ईरानी सैनिक, ब्रिटिश आयल टैंकर पर क़ब्ज़ा कर रहे थे तो वहीं निकट ब्रिटिश युद्धपोत मौजूद था लेकिन ब्रिटिश सैनिकों ने अपने आयल टैंकर को बचाने के लिए आगे बढ़ने की कोशिश नहीं की तो फिर उनसे यह कौन आशा रख सकता है कि वह अरब देशों के जहाज़ों की सुरक्षा करेंगे?
इसके साथ ही यह भी ध्यान रहे कि आज के ब्रिटेन और युरोप की तुलना, द्वतीय विश्व युद्ध से पहले के युरोप व ब्रिटेन से नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दौरान अमरीका ने उनके पंख कुतर दिये हैं ताकि वह पूरी तरह से अमरीका पर निर्भर रहें इस लिए अब इन देशों के पास एसी नौसेना ही नहीं है जो फार्स की खाड़ी में ईरानी नौसेना से टक्कर ले सके।
ईरान ने गत दो- तीन दशकों के दौरान, अपनी नौसेना और मिसाइल शक्ति पर बहुत काम किया है और आज समुद्र में ईरान की हमले और रक्षा की शक्ति इतना ज़्यादा है कि, अच्छा खासा शक्तिशाली होने के बावजूद अमरीका भी ईरानी नौसेना से भिड़ने से बच रहा है और उसने अपने सभी जहाज़ों को हिंद महासागर भेजकर पीछे हटा लिया है।
इन हालात में फार्स की खाड़ी के अरब देशों को यह समझना चाहिए कि इस क्षेत्र की सुरक्षा, क्षेत्रीय देशों के सहयोग पर निर्भर है और क्षेत्र की सुरक्षा को विदेशियों पर डालने का सब से अधिक नुक़सान स्वंय इन्ही देशों को होगा।