ईरानी विदेश मंत्री का इशारा ट्रम्प के उस बयान की ओर था, जिसमें उन्होंने ईरान द्वारा अमरीकी ड्रोन को मार गिराने के बाद जवाबी हवाई हमलों का आदेश देने और हमले से ठीक 10 मिनट पहले उस आदेश को वापस लेने का दावा किया था।
ट्रम्प का कहना है कि मैंने अमरीकी सेना की सेंट्रल कमांड को ईरान में 3 लक्ष्यों पर हमला करने का आदेश दे दिया था, लेकिन अंतिम समय में मैंने अमरीकी जनरलों से पूछा कि इस हमले में कितने ईरानियों की जान सकती है, तो उन्होंने कहा, लगभग 150 ईरानी इस हमले में मारे जा सकते हैं।
ट्रम्प का कहना था कि एक आधुनिक ड्रोन के बदले में 150 लोगों की जान लेना कुछ मुनासिब नहीं है, इसलिए मैंने हमले का आदेश वापस ले लिया।
ट्रम्प के इस दावे पर कटाक्ष करते हुए ज़रीफ़ ने कहा है कि अमरीकी राष्ट्रपति हमारे 150 लोगों की जान की चिंता कर रहे हैं, जबकि उनसे पूछना चाहिए कि अमरीका ने परमाणु हमलों में कितने लोगों की जान ली है।
इसके अलावा अमरीका ने वियतनाम, इराक़, सीरिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, लीबिया और लेबनान में कितने आम नागरिकों को मौत के घाट उतारा है।
ईरानी विदेश मंत्री ने कहा, अमरीका आज दावा करता है कि हम ईरान को परमाणु हथियार नहीं बना देंगे, लेकिन अगर हम परमाणु हथियार बनाने का इरादा करते तो तुम हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे, लेकिन हम यह नहीं चाहते हैं। हमारा मानना है कि ऐसे हथियार उन्हीं लोगों के लिए जो 150 तो क्या लाखों लोगों और आने वाली नस्लों तक को परमाणु बम मारकर नष्ट कर देते हैं।
इसलिए यही कहा जा सकता है कि अमरीकी राष्ट्रपति ने ईरान पर हमले का आदेश दिया भी था तो ईरानियों की जान की सुरक्षा की ख़ातिर वापस नहीं लिया, बल्कि अमरीका को ईरान की सैन्य शक्ति और क्षेत्र में प्रभाव का अंदाज़ा अच्छी तरह से हो गया, जिसके कारण ईरान के मुक़ाबले में वह असहाय नज़र आ रहा है।
ख़ास बत यह है कि ईरान ने अमरीका का आधुनिकतम ड्रोन रूसी, चीनी या अमरीकी वायु रक्षा प्रणाली से नहीं गिराया है, बल्कि स्वदेश निर्मित मिसाइल से मार गिराया है।
ट्रम्प अपने ही सहयोगियों की नज़र में डरपोक, ढुलमुल और झूठे व्यक्ति बन गए हैं। ट्रम्प की इस छवि ने महा शक्ति के रूप में अमरीका को भारी नुक़सान पहुंचाया है। क्योंकि ठीक 10 मिनट पहले हमले का आदेश वापस लेने का दावा ऐसा झूट है जिस पर कोई बच्चा भी यक़ीन नहीं करेगा।