इस्लामी सहयोग संगठन देशों के सम्मेलन के साथ ही फ़ार्स खाड़ी सहयोगी परिषद और अरब संघ की आपात बैठको का आयोजन मक्का में किया गया।
इन सम्मेलनों में सऊदी अरब और यूएई में होने वाले हालिया हमलों, तेहरान के साथ बढ़ते तनाव और फ़िलिस्तीन समस्या जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
सऊदी किंग ने जल्दबाज़ी में मुस्लिम नेताओं को रमज़ान के अंतिम दिनों में मक्का आने का निमंत्रण दिया, ताकि संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा कर सकें। हालांकि आले सऊद शासन की यह कोशिश उसकी विरोधाभासी नीतियों को दर्शाती है।
वास्तव में यह तीनों सम्मेलन, बहुत ही संवेदनशाली राजनीतिक मुद्दों पर सऊदी अरब के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से आयोजित किए गए थे।
यह पहली बार नहीं है कि राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आले सऊद शासन ने मुसलमानों के सबसे पवित्र शहर मक्के का प्रयोग किया हो, इससे पहले भी कई बार मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि आले सऊद शासन इस्लामवादियों के बिना इस्लाम चाहता है, इसलिए कि अधिकांश इस्लामवादी और इस्लामी विद्वान सऊदी जेलों में बंद हैं।
आले सऊद ने क़रीब 1925 से मुसलमानों के दो सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों मक्का और मदीना पर क़ब्ज़ा किया हुआ है, उसी के बाद से यह वहाबी शासन अपने राजनीतिक हितों के लिए उनका दुरुपयोग करता आ रहा है।
मक्का और मदीना और वहां पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों का सेवक होने का दावा करके ही आले सऊद अपने शासन को वैधता प्रदान करते रहे हैं।
हालांकि आले सऊद शासन ने दोनों ही पवित्र शहरों में हज़ारों वहाबी प्रचारक तैनात कर रखे हैं, जो दुनिया भर से मक्का और मदीना पहुंचने वाले मुसलमानों पर अपनी संकीर्ण विचारधारा थोपने का प्रयास करते हैं और यहां किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के प्रति चेतावनी देते हैं।
लेकिन यही वहाबी प्रचारक और मौलवी आले सऊद शासकों की प्रशंसा करते नहीं थकते और तीर्थयात्रियों पर भी उनके लिए दुआ करने का दबाव बनाते हैं।
हर वह मुसलमान जो आले सऊद शासन का आलोचक है या साम्राज्यवादियों शक्तियों का विरोध करता है, उसे मक्का में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है।
इसका एक उदाहरण, 1980 के दशक में मक्का में अमरीका मुर्दाबाद के नारे लगाने के जुर्म में ईरानी श्रद्धालुओं पर गोलियां बरसाना है।
हालिया वर्षों में क़तर के नागरिकों और ग़ज्ज़ा के फ़िलिस्तीनियों को हज के अवसर पर वीज़ा जारी नहीं किए गए और उन्हें हज से ही प्रतिबंधित कर दिया गया।
सऊदी अरब और यूएई, अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प से निराश होने के बाद अब ईरान के ख़िलाफ़ मुस्लिम देशों को लामबंद करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि मक्का सम्मेलनों में ईरान के ख़िलाफ़ मुस्लिम देशों का समर्थन हासिल करने में दोनों देश बुरी तरह से नाकाम हो गए।