यह बात सही है कि सैनिक टकराव की आशंका थोड़ी बहुत कम हुई है क्योंकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान को डराने और वार्ता की मेज़ पर मजबूर होकर बैठने के लिए जो भी तरीक़े अपनाए वह सब नाकाम रहे। अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने ईरान के सामने जो 12 शर्तें रखी हैं उनका लक्ष्य यह है कि ईरान घुटने टेक दे, परमाणु कार्यक्रम बंद कर दे, बैलिस्टिक मिसाइलों का कार्यक्रम बंद कर दे, लेबनान, यमन, इराक़ और फ़िलिस्तीन तथा अफ़ग़ानिस्तान में अपने घटक संगठनों का समर्थन रोक दे। क्योंकि यही सारी चीज़ें ईरान की ताक़त का आधार है।
यह भी तय है कि अमरीका की सैनिक तैयारियों को देखकर ईरान के वह अधिकारी पछता रहे होंगे जो परमाणु समझौते के सूत्रधार या पक्षधर थे, क्योकि वर्तमान स्थिति को देखकर तो यही लगता है कि ईरान ने अकारण ही अपना परमाणु कार्यक्रम सीमित किया था।
मगर अब ईरान जो भी क़दम उठाएगा वह एसा होगा कि उसे पछताना न पड़े। अब इस बीच अगर मध्स्थता करने की कोशिश रंग लाती है और कोई वार्ता होती है तो इस बार ईरान और अधिक सावधान होगा, कोई भी विशेष्टता देने से पहे सौ बार सोचेगा। ईरान का ज़ोर इस बात पर होगा कि ठोस गैरेंटी मिले।
ईरानियों ने साबित कर दिया कि वह संकट शुरू होने के आरंभिक दिनों में उनकी तैयारी अमरीका से ज़्यादा थी। ईरान की छोटी नौकाएं चर्चा का विषय बनीं जिन पर मिसाइल स्थापित किए जाने की ख़बरें आने लगीं। यह नौकाएं अमरीका के विमान वाहक पोत तथा दूसरे बड़े सैनिक समुद्री जहाज़ों के लिए बहुत ख़तरनाक मानी जाती हैं। यह रिपोर्ट भी आई कि इराक़ में ईरान के घटक संगठन भी अमरीकी सैनिकों पर हमले के लिए तैयार हो चुके थे। उधर यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन के ड्रोन विमानों ने भी हंगामा मचा दिया। ज़ाहिर है कि घटक होने का मतलब यही है कि कठिन घड़ी में काम आए।
राष्ट्रपति ट्रम्प इन दिनों फ़ार्स की खाड़ी के इलाक़े में गंभीर संकट से गुज़र रहे हैं जो ख़ुद उनका अपना पैदा किया हुआ है। ट्रम्प अपनी इज्ज़त बचाने के लिए हाथ पांव मार रहे हैं। क्योंकि ईरान को झुकाने की उनकी सारी तकरीबें नाकाम हो गईं। इसका पता ट्रम्प और उनके प्रभारी रक्षा मंत्री के इस बयान से चलता है कि उन्होंने फ़ार्स खाड़ी के इलाक़े में सैनिक उपस्थिति में वृद्धि युद्ध के लिए नहीं बल्कि अमरीकियों पर ईरानी हमलों को रोकने के लिए की है।
यह सरासर झूठ है वैसे झूठ बोलना उनके लिए कोई नई बात भी नहीं है। सवाल यह है कि अगर अमरीका जंग नहीं चाहता तो सैनिक उपस्थिति बढ़ाने और धमकियां देने में क्यों व्यस्त है, वह ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात क्यों करता है। अमरीका न तो ईरान में सत्ता बदल सकता है और न ही ईरान की इस्लामी व्यवस्था का रवैया बदलना उसके बस की बात है।
ईरान ने सीरिया की सरकार तो नहीं गिरने दी और हमको यह लगता है कि वह आने वाले चुनावों में ट्रम्प की सरकार को गिरा देगा जिस तरह ईरान ने जिमी कार्टर की सरकार गिरवाई थी। कार्टर दूसरी बार चुनाव नहीं जीत पाए थे। क्या कार्टर वाला इतिहास ट्रम्प के साथ ही दोहराया जाएगा?
बड़ी ताक़तों के लिए युद्ध शुरू कर देना तो आसान होता है विशेषकर तब जब मुक़ाबले पर कमज़ोर देश हो लेकिन सबसे कठिन चरण युद्ध शुरू हो जाने के बाद आता है। इस संदर्भ में सीरिया, लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान और यमन में होने वाले युद्धों की मिसाल दी जा सकती है।
इस संदर्भ में ईरानियों को चाहिए कि उत्तरी कोरिया की तरह अमल करें। ट्रम्प से कैसे निपटा जाए इस बारे में उत्तरी कोरिया ने बड़ा अच्छा उदाहरण पेश किया है।
आख़िर में हम यह कहना चाहते हैं कि हालिया संकट इसलिए उत्पन्न हुआ कि अमरीका ईरान का तेल निर्यात ज़ीरो बैरल तक पहुंचाने की कोशिश में था अब यह अलग बात है कि ईरान का तेल सामान्य रूप से एक्सपोर्ट हो रहा है और ईरानी तेल टैंकर अमरीकी युद्धक नौकाओं और युद्धपोतों के सामने से गुज़र कर जा रहे हैं जबकि दूसरी ओर इमारात की अलफ़ुजैरा बंदरगाह पर अमरीका के घटक देशों के तेल टैंकर निशाना बन रहे हैं। इसका मतलब यह है कि ट्रम्प ने सैनिक युद्ध के बजाए आर्थिक युद्ध की जो धमकी दी है वह भी बेबुनियाद है। आर्थिक युद्ध में भी सफलता मिलने वाली नहीं है बल्कि उसके ख़तरे बहुत अधिक हैं।
अब तक जो कुछ हुआ है उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि ट्रम्प और उनके घटकों को जो युद्ध का ढोल पीट रहे थे नुक़सान हुआ है।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार