मुज़ावी रशीद ने संयुक्त अरब इमारात के फ़ुजैरा क्षेत्र में हुए धमाके और यमन के अंसारुल्लाह संगठन द्वारा सऊदी अरब की तेल पाइप लाइनों पर किए गए हमले की तरफ़ इशारा करते हुए लिखा है कि इन घटनाओं से सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात की कमज़ोरी जगज़ाहिर हो गई है। उन्होंने कहा है कि ये दोनों देश काफ़ी समय से अमरीका व इस्राईल को ईरान से युद्ध के लिए उकसा रहे हैं और ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद ये वाॅशिंग्टन को परमाणु समझौते से निकलने और ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध बहाल करने के लिए तैयार करने में सफल हो गए लेकिन इस बात की कोई संभावना नहीं है कि अमरीका और इस्राईल, ईरान के साथ युद्ध आरंभ कर दें।
सऊदी अरब की इस टीकाकार ने बल देकर कहा है कि ईरान के साथ किसी भी प्रकार के सीधे सैन्य टकराव की स्थिति में सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात ख़तरे और मज़ाक़ का पात्र बन जाएंगे क्योंकि उनकी छोटी सी सेना की संख्या, दक्षता व संघर्ष की रणनीति की दृष्टि ईरान की सेना से तुलना नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा है कि यद्यपि सऊदी व इमारात के पास अत्यंत विकसित व नए लड़ाकू विमान हैं लेकिन यमन युद्ध में उनके क्रियाकलाप ने उनकी अनुपयोगिता को सिद्ध कर दिया है। अलमुज़ावी का कहना है कि मिस्री, सूडानी व सेनेगाली जैसे विदेशी सैनिक भी मध्यपूर्व के क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा के संबंध में ईरानियों के संकल्प का मुक़ाबला नहीं कर सकते और सऊदी अरब को यह जान लेना चाहिए कि विदेशी सैनिक कभी भी एक मज़बूत सेना की जगह नहीं ले सकते।
सऊदी अरब की इस टीकाकार ने बल देकर कहा है कि यद्यपि ईरान सैन्य टकराव में रुचि नहीं रखता और उसकी अर्थव्यवस्था अमरीकी दबाव के चलते कमज़ोर हुई है लेकिन सऊदी अरब और उसके घटक ईरान के साथ हर प्रकार के सीधे सैन्य टकराव में पराजित हो जाएंगे अतः उनके लिए बेहतर होगा कि वे युद्ध के विकल्प को दरकिनार करके ईरान के साथ अपने संबंधों पर पुनर्विचार करें। मुज़ावी रशीद ने लिखा है कि ओमान, क़तर और कुवैत जैसे फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य अरब देश भी ईरान के साथ सैन्य टकराव के विरोधी होंगे इस लिए सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात के पास एकमात्र मार्ग, कूटनीति ही है।