यह तनाव सऊदी अरब, बहरैन और इमारात की नीतियों और क़तर की रणनीति में गंभीर टकराव की वजह से उत्पन्न हुआ है। कभी लीबिया, कभी यमन, कभी सीरिया और कभी इराक़ तथा कभी सूडान के पटल पर यह मतभेद नज़र आता है। यह देश अपनी लड़ाइयां अलग अलग देशों में लड़ रहे हैं।
शुक्रवार की शाम शैख़ जासिम ने कई ट्वीट किए जिनमें उन्होंने फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद की भीतरी स्थिति तथा ईरान के बारे में इस परिषद के सदस्य देशों के स्टैंड के बारे में लिखा। उन्होंने वर्ष 2015 में होने वाले ईरान परमाणु समझौते के बारे में सऊदी अरब, बहरैन और इमारात के रवैए पर टिप्पणी की साथ ही इस समझौते से अमरीका के बाहर निकल जाने के बारे में बात की।
उन्होंने सऊदी अरब, इमारात और बहरैन का नाम लिए बिना लिखा कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के कुछ देश इलाक़े में तनाव को हवा दे रहे हैं लेकिन उनकी गतिविधियों से ईरान और अमरीका के बीच कोई टकराव होने वाला नहीं है बल्कि होगा यह कि आख़िरकार अमरीका ईरान से वार्ता करेगा और परमाणु समझौता बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
शैख़ जासिम बिन हमद ने लिखा कि इलाक़े में हालिया तनाव को फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के कुछ देश हवा दे रहा हैं वह अपना देख रहे हैं कि अमरीका से टकराव हो और ईरान इस टकराव में पराजित हो जाए, यही सपने वह 2015 के परमाणु समझौते से पहले भी देख रहे थे।
क़तर के पूर्व प्रधानमंत्री यहीं नहीं रूके उन्होंने आगे लिखा कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद इस समय ध्वस्त होती जा रही है और यह स्थिति इस परिषद के सदस्य देशों के हितों को तबाह कर देगी और इससे केवल उसी को फ़ायदा होगा जो ईरान के साथ नया परमाणु समझौता करने की कोशिश में है और हम बस ढोल ही पीटते रह जाएंगे जैसा कि इससे पहले भी हो चुका है। शैख़ जासिम ने कहा कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद और अरब जगत का संयुक्त एजेंडा होना चाहिए जिसका सब सम्मान करें और हम केवल दूसरों के लिए ढोल पीटने वाले न बनें।
शैख़ जासिम बिन हमद के इन ट्वीट्स पर बहरैन के विदेश मंत्री ने बड़े आक्रोश में जवाबी ट्वीट किए। शैख़ ख़ालिद बिन ख़लीफ़ा ने ट्वीट किया कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद ध्वस्त नहीं हो रही है, जो भी यह बात कह रहा है वह ग़लत कह रहा है। परिषद के एक सदस्य ने इस संगठन को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश की थी जिसकी रोक थाम कर ली गई है। ईश्वर कृपा करे उस देश पर जो अपनी औक़ात को समझता है और उसके अंदर रहता है।
इससे पहले भी क़तर के विदेश मंत्री मुहम्मद बिन अब्दुर्रहमान आले सानी फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के बारे में कह चुके हैं कि इस संगठन के पास कोई ताक़त और क्षमता बाक़ी नहीं बची है।
अरब देशों पर और विशेष रूप से फ़ार्स खड़ी के तटवर्ती अरब देशों पर यह गंभीर टिप्पणी की जाती है कि इनके पास संसाधन तो बहुत हैं लेकिन वह इन संसाधनों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों व स्थिरता के लिए प्रयोग करने के बजाए क्षेत्र में अपनी ताक़त का लोहा मनवाने और अन्य देशों को दबाने के लिए नष्ट कर रहा हैं। यह देश पश्चिमी देशों से बड़े पैमाने पर हथियार ख़रीद रहे हैं लेकिन हालत यह है कि अमरीका बार बार उनका अपमान करता है और वह इस अपमान का विरोध करने की भी स्थिति में नहीं है। इन देशों की समझ में यह बात नहीं आ रही है कि विश्व व्यवस्था में बदलाव आ चुका है वह अमरीका की छत्रछाया में पलते रहने की आदत छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। किसी भी तरह बस अपनी तानाशाही सरकार को बचाए रखना चाहते हैं और इसके लिए वह अपनी जनता की दुशमनी भी मोल ले रहे हैं। यह देखने वाली बात होगी कि यह सिलसिला कब तक चलता है?