दूसरे देशों विशेषकर अमेरिका के विरोधी देशों पर प्रतिबंध लगाना वाशिंग्टन की विदेश नीति का एक मूल सिद्धांत है और यह चीज़ डोनल्ड ट्रंप के सत्ताकाल में गति पकड़ गयी है।
इसी परिप्रेक्ष्य में अमेरिका द्वारा 8 मई 2018 को ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते से निकल जाने के बाद तेहरान के विरुद्ध प्रतिबंधों को दो चरणों में लागू किया गया। ये प्रतिबंध एकपक्षीय थे और ये सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव नंबर 2231 के विरुद्ध हैं।
अमेरिका के अनुसार यह इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध हैं। इसके बावजूद अमेरिका इन प्रतिबंधों को और कड़ा बनाने की चेष्टा में है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार 22 मार्च को घोषणा की है कि 14 व्यक्तियों और 17 संस्थाओं पर भी प्रतिबंध लगाये जा रहे हैं।
दूसरे शब्दों में यह प्रतिबंध इससे पहले ईरान के खिलाफ लगाये गये प्रतिबंधों के अलग हैं। अमेरिकी अधिकारियों के दावों के अनुसार इन व्यक्तियों व संस्थाओं का संबंध ईरान के हथियार कार्यक्रम से है और इन्होंने ईरान के सामूहिक विनाश के हथियारों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इसी प्रकार अमेरिकी वित्तमंत्रालय की घोषणा में आया है कि जो व्यक्ति या संस्था ईरान के हथियार कार्यक्रम से सहकारिता करेगी उसके खिलाफ यह प्रतिबंध लागू होंगे।
यह अमेरिकी दावे ऐसी स्थिति में सामने आ रहे हैं जब परमाणु ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी ने बारमबार अपनी रिपोर्टों में कहा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है और उसमें किसी प्रकार का दिशाभेद नहीं है। इसी प्रकार इस अंतरराष्ट्रीय एजेन्सी ने बल देकर कहा है कि ईरान परमाणु समझौते के प्रति अपने समस्त वचनों के प्रति कटिबद्ध रहा है।
अमेरिकी वित्तमंत्रालय ने इसी प्रकार ईरान के पास सामूहिक विनाश के हथियार होने का दावा किया है जबकि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कई साल पहले इस बात का फतवा दे चुके हैं कि परमाणु और सामूहिक विनाश के हथियारों को बनाना और रखना हराम है और ईरानी अधिकारियों ने भी बारमबार बल देकर कहा है कि ईरान की रक्षा नीति में इस प्रकार के हथियारों का कोई स्थान नहीं है। रोचक बात यह है कि अमेरिका ने अपने निराधार दावे की पुष्टि के लिए किसी प्रकार का प्रमाण भी पेश नहीं किया।
बहरहाल अमेरिकी अधिकारी इस बात को भली- भांति जानते हैं कि ईरान के पास किसी प्रकार के परमाणु और सामूहिक विनाश के हथियार नहीं हैं और वे केवल अपने अवैध प्रतिबंधों का औचित्य दर्शाने के लिए इस प्रकार का दावा करते हैं और उनका मूल लक्ष्य ईरानी राष्ट्र को वाशिंग्टन की वर्चस्ववादी नीतियों के समक्ष घुटने टेकने के लिए बाध्य कर देना है।