नौरोज़ का प्राचीन जश्न न केवल यह कि समय बीतने के साथ भुलाया नहीं गया बल्कि यह ईरान की विभिन्न जातियों और वर्गों के मध्य एकता का मंच बन चुका है यही नहीं अब तक नौरोज़ , वर्तमान ईरान की सीमाओं से पार निकल कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कर चुका है। नौरोज़ को एक अंतरराष्ट्रीय त्योहार के रूप में स्वीकार किया गया है। नौरोज़ को आज भी विशेष वैभव के साथ मनाया जाता है और न केवल ईरान बल्कि क्षेत्र के कई देशों में मनाया जाता है। यही नहीं यूनेस्को के सदस्य देशों ने उसे विश्व की आध्यात्मिक धरोहर के रूप में स्वीकार कर लिया और सितंबर 2009 में विश्व की आध्यात्मिक धरोहर के रूप में यूनिस्को में उसका पंजीकरण किया गया। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने वर्ष 2010 के फरवरी महीने में पहली फरवरदीन को अंतरराष्ट्रीय नौरोज़ दिवस के रूप में मान्यता दी और 21 मार्च के दिन को अपने कैलेन्डर में स्थान दिया। 21 मार्च के दिन को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में जिस मसौदे को पारित किया गया उसमें इस प्रकार आया है” यह ऐसा प्राचीन ईरानी त्योहार है जो तीन हज़ार साल से अधिक पुराना है और आज 30 करोड़ से अधिक लोग इस दिन जश्न मनाते हैं”
नौरोज़, ईरान का राष्ट्रीय पर्व है जो बसंत ऋतु के आगमन से आरंभ होता है और नए साल की 13 तारीख़ तक रहता है। यह त्योहार नए वर्ष के आगमन और शीत ऋतु की समाप्ति व ग्रीष्म ऋतु के आरंभ का सूचक होता है। प्रकृति के इस परिवर्तन पर ईरानी जनता के जीवन में विभिन्न प्रकार के बदलाव आते हैं जो अलग-अलग संस्कारों और रीति-रिवाजों में दिखाई देते हैं। वास्तव में नौरोज़, ईरान की सीमा के भीतर व बाहर, ईरानियों के लिए एकता का प्रतीक है। ईरानी, पूरी दुनिया में , भौगोलिक दुरियों के बावजूद , एक साथ , एक समय पर , नौरोज़ का स्वागत करते हैं और " हफ़्त सीन" दस्तरखान पर बैठकर नये साल का जश्न आरंभ करते हैं। हफ्तेसीन दस्तर खान वास्तव में वह दस्तरखान होता है जिसपर फारसी भाषा के अक्षर " सीन " से आरंभ होने वाली सात चीज़े रखी होती हैं
ईरान में इस्लाम के आगमन के बाद से लेकर आज तक ईरानी नौरोज़ का जश्न मनाते हैं। सामानी और आले बूये काल में यद्यपि इस जश्न में कुछ परिवर्तन हुए परंतु उसे बड़ी शान के साथ मनाया जाता था। इस्लामी और सल्जूक़ी काल में कुछ क्षेत्रों में नौरोज़ की तारीख़ भिन्न थी। 16 वीं और 17 वीं ईसवी शताब्दी विशेषकर सफवी काल में ईदे नौरोज़ की कुछ रीति रिवाजो ने धार्मिक रूप धारण कर लिया। कुछ रिवाजों से नौरोज़ को विशेष महत्व हासिल हुआ। इस आधार पर ईरानी मुसलमान नौरोज़ को बहुत मुबारक दिन मानते हैं और उन्होंने नौरोज़ की परम्परा को इस्लामी परम्परा से जोड़ दिया। इस तरह उसे विशेष रूप एवं वैभव हासिल हो गया।
इस प्राचीन जश्न के अब तक बाकी रहने का राज़ यह है कि इसमें बहुत से मानवीय व नैतिक गुण हैं। विशेषज्ञ नौरोज़ को मानव समाज की एक बहुत बड़ी धरोहर समझते हैं। वास्तव में नौरोज़ के रीति रिवाज , मनुष्य को प्रकृति से जोड़ते हैं और उसे ईश्वर से निकट करते हैं। वसन्त, बेहद खूबसूरत मौसम है। इस मौसम में, पौधे में कोंपले निकलती हैं, कलियां मुस्कराती हैं और फूलों में बदल जाती हैं और फिर पेड़, फल देते हैं और इस पूरी प्रक्रिया से गुजरते समय प्रकृति बेहद सुन्दर लगती है और इसी सुन्दरता का आनंद उठाने के लिए ईरान जैसे देशों में लोग बहार के मौसम में कुछ समय, बाहर और प्रकृति की गोद में ज़रूर गुज़ारते हैं और बहार की सुन्दरता ऐसी होती है कि मनुष्य के मन को भाती है क्योंकि प्रकृति से उसका गहरा संबंध होता है इस लिए वह प्रकृति की गोद में आनंद का आभास करता है । नौरोज़ समाज में ताज़गी भरता है , हर साल जैसे ही नौरोज़ का त्योहार निकट आता है ईरान के नगरों और गांवों में एक प्रकार की प्रफुल्लता व ताज़गी को महसूस किया जाता है। नौरोज़ के समय , ईरान की यात्रा करने वाले विदेशी पर्यटक तक इस बात को अच्छी तरह से महसूस करते हैं और इसके लिए वह ईरान की तारीफ भी करते हैं।
ईरान में हर साल, नववर्ष, पवित्रता व स्वच्छता से आरंभ होता है। " ख़ाने तकानी " नामक रीति के अंतर्गत , नये साल से पहले हर ईरानी , अपने घर की पूरी तरह से सफाई करता है। इसके साथ ही सरकार , नगरों और सड़कों की विशेष रूप से सफायी कराती है। इस तरह से ईरान में नये वर्ष से थोड़ा पहले , हर जगह लोग साफ सफाई में व्यस्त नज़र आते हैं। घर में सफाई होती है, खिड़कियों की शीशे और दरवाज़े साफ किये जाते हैं, बहुत से लोग घर में रंग कराते हैं और सामान भी नये खरीदते हैं। पर्दे और कालीन धोए जाते हैं। इसी लिए ईरान में साल के अंतिम दिनों में कालीनों की धुलाई करने वाले , साफ सफाई करने वाले और दुकानदारों की व्यस्तता बहुत अधिक बढ़ जाती है।
ईरानी नये वर्ष के अवसर पर , नये कपड़े खरीदते हैं , सूखे मेवे, मिठाइयां आदि खरीदते हैं इस तरह से साल के अंतिम दिनों में बाज़ारों में तिल रखने की भी जगह नहीं होती। नौरोज़ में चूंकि लोग एक दूसरे के घर भेंट के लिए जाते हैं इस लिए सब ही की यही इच्छा होती है कि वह अपने मेहमानों की अच्छी तरह से आव भगत करे इस लिए लोग अच्छी अच्छी चीज़ें खरीदते हैं ताकि मेहमानों का अच्छी तरह से सत्कार हो सके। नया साल , व्यापारियों और दुकानदारों के लिए ईद की भांति होता है और वह साल भर की कमाई के इतना , नये साल की खरीदारी में कमा लेते हैं। दुकानों में माल भरा रहता है और इसी तरह विभिन्न क्षेत्रों में अस्थायी बाज़ार बनाए जाते हैं जहां नौरोज़ और नये वर्ष से संबंधित सामान खूब बिकता है। जैसे जैसे पुराना साल खत्म होता है इन बाज़ारों में भीड़ बढ़ती जाती है। इन बाज़ारों की रौनक़, नये साल के आरंभ से ठीक पहले तक बाक़ी रहती है।
इस्फंद , ईरानी वर्ष का अंतिम महीना है इस महीने में अनाज बोए जाते हैं , यही वजह है कि इस महीने में नौरोज़ का पौधा उगाया जाता है जो एक प्रतीकात्मक परंपरा है और हज़ारों वर्षों से ईरानी परिवारों में चली आ रही है। हरियाली उगाने का काम पहले से ही शुरु हो जाता है और नये साल के आरंभ के साथ ही उसे " हफ्तसीन " दस्तरखान पर रख दिया जाता है। हफ्तसीन पर सीन से आरंभ होने वाली जो सात चीज़ें रखी जाती हैं उनमें से एक यह हरियाली भी है जिसे फारसी में " सब्ज़ा" कहा जाता है। प्रायः यह हरा पौधा, गेहूं, मसूर या मूंग का होता है। बहुत से लोग ढेर सारा मूंग उगाते हैं और फिर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को उपहार में देते हैं ताकि वह लोग इसे साल के पहले दिन की पंरपरा के रूप में प्रयोग कर सकें।
नौरोज़ के अवसर पर खाने पीने की विभिन्न चीज़ें और मिठाइयां विशेष रूप से तैयार की जाती हैं और उन से मेहमान का स्वागत किया जाता है। ईरान के बहुत से क्षेत्रों में महिलाएं, नौरोज़ आने से पहले ही हलवा और मिठाई बनाने का काम शुरु कर देती हैं। इसके साथ हम आप को यह भी बता दें कि नौरोज़ से पहले अलग अलग समय पर और अलग अलग दिनों में विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। नये वर्ष की पूर्व संध्या पर, मछली के साथ साग पुलाव , साग, पुलाव और साग कूरमा जैसे पकवान तैयार किये जाते हैं और पूरा परिवार एक साथ बैठ कर इन व्यंजनों का आनंद लेता है।
नये वर्ष से पहले और जाने वाले वर्ष के अंतिम मंगलवार की रात अर्थत बुधवार से पहले की रात को " सूरी बुधवार" मनाया जाता है। यह पूरे ईरान में मनाया जाता है। साल के अंतिम मंगलवार की शाम को सड़कों और खुली जगहों पर आग जलायी जाती है और लोग आग के ऊपर से कूदते हैं । इस पंरपरा का इतिहास बहुत पुराना है। इस की शुरुआत भी साफ सफाई से हुई थी और सड़कों और राहों को साफ करके कांटे और पत्तियां आदि जलायी जाती थीं फिर धीरे धीरे इसे पिछले साल की बुराईयों को जलाने के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा।नौरोज़ से पहले ईरानी , अपने दिवंगत रिश्तेदारों को भी ज़रूर याद करते हैं। नये वर्ष से पहले लोग , क़ब्रिस्तान ज़रूर जाते हैं जहां इस अवसर पर गरीबों को खाना खिलाते हैं, क़ब्रों पर फूल चढ़ाते और खजूर बांटते हैं। लोग क़ब्रों पर जाकर मोमबत्ती जलाते हैं और इस तरह से यह दर्शाते हैं कि वह अपनों को भूले नहीं हैं। नये वर्ष के अवसर पर लोग गरीबों की मदद करते हैं । नये साल से पहले लोग ग़रीबों की हर तरह से मदद करते हैं। पूरे ईरान में जगह जगह स्टाल लगाए जाते हैं और लोग गरीबों के लिए विभिन्न प्रकार की चीज़ें वहां देते हैं। इस तरह से नये साल से ठीक पहले, जहां बाज़ारों में हलचल रहती है और लोग खरीदारी में व्यस्त रहते हैं वहीं वह गरीबों को भी नहीं भूलते और कोशिश करते हैं कि नया साल, उनके लिए भी खुशियां लेकर आए। ईरानी नये वर्ष की यह एक बहुत अच्छी विशेषता है।वसन्त ऋतु वास्तव में नवीनीकरण का भी मौसम है। इस मौसम में हर चीज़ नयी हो जाती है । हमें भी अपने भीतर नये और अच्छे बदलाव के लिए सदा कोशिश करते रहना चाहिए और हमेशा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हमारे मन व मस्तिष्क की बगिया कहीं , ठहराव की बर्फ में दब कर मुरझा तो नहीं रही है यदि एेसा है तो हमें अपने भीतर भी एक बहार की ज़रूरत है। ईरानी जनता पुराने वर्ष के अंतिम दिनों में और नये वर्ष का स्वागत , अपने भीतर , अपने घर, अपने देश और अपने समाज में नयापन लाने की कोशिश द्वारा करती और इस तरह से पूरी ताज़गी के साथ नये वर्ष का स्वागत करती है। सच में बहार का इस से अच्छा स्वागत और क्या हो सकता है?