इस्लामी क्रांति के संरक्षक बल सिपाहे पासदारान के ब्रिगेडियर जनरल कासिम सुलैमानी ने कहा है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान के मुकाबले में दुश्मनों के षडयंत्रों का विफल होना निश्चित है। उन्होंने बल देकर कहा कि साम्राज्यवादी भावना दुश्मन की प्रवृत्ति रही हैं और राष्ट्रों और देशों के हितों की अनदेखी दुश्मन की पराजय के कारण हैं।
उन्होंने कहा कि अवैध सरकारों पर पूंजी निवेश दुश्मन की विफलता का एक अन्य कारण है। इसी प्रकार ब्रिगेडियर जनरल क़ासेम सुलैमानी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति हर स्थान पर राष्ट्रों का अपमान करते हैं और सऊदी अरब अपनी अस्थिरता के कारण अमेरिका पर निर्भर हो गया है किन्तु उसे जान लेना चाहिये कि जब अमेरिका अपने हितों को ख़तरे में देखेगा तो सऊदी अरब को भी खत्म कर देगा।
इसी प्रकार ब्रिगेडियर जनरल क़ासिम सुलैमानी ने आतंकवादी गुट दाइश की पराजय और इराक से अमेरिकियों को बाहर निकालने के बारे में भी कहा कि यह इस्लाम की शक्ति है कि मुसलमान राष्ट्र एकजुट होते हैं और दुश्मनों पर हमला करते हैं।
इराक और सीरिया पर युद्ध थोपने और आतंकवादी गुट दाइश के अस्तित्व में आने का लक्ष्य क्षेत्र का विभाजन था और इस कार्य के लिए आतंकवादियों का प्रयोग हथकंडे के रूप में किया गया परंतु प्रतिरोध की सफलता से दुश्मनों के समस्त षडयंत्रों पर पानी फिर गया।
लेबनान के अलबेना समाचार पत्र के प्रधान संपादक नासिर क़िन्दील प्रतिरोध के प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि वर्ष 2006 में होने वाले युद्ध के बाद क्षेत्र की स्थिति बदल गयी थी और उसने दर्शा दिया कि समस्त चीज़ों का संबंध राष्ट्रों के इरादों और सत्य पर उनके ईमान व प्रतिरोध से है।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इराक और सीरिया के विभाजन के लिए हालिया कुछ वर्षों में जो कुछ किया गया वह क्षेत्र के राष्ट्रों के लिए बहुत बड़ा ख़तरा था। इस कार्य के लिए अमेरिका और जायोनी शासन ने आले सऊद जैसी सरकारों का प्रयोग हथकंडे के रूप में किया परंतु अमेरिका की अगुवाई में काम करने वाले मोर्चे को इस्लामी मोर्चे के मुकाबले में पराजय का कटु स्वाद चखना पड़ा।
वास्तव में अगर प्रतिरोध न होता तो आज क्षेत्र पर दाइश का कब्ज़ा होता और अमेरिका क्षेत्रीय राष्ट्रों को डराता कि उनके अंदर खतरे से मुकाबला करने की क्षमता नहीं है परंतु प्रतिरोध ने सफलता प्राप्त करके दर्शा दिया कि खतरों से मुकाबला किया जा सकता है और दुश्मन से नहीं डरना चाहिये।
बहरहाल अमेरिका और इस्राईल ने क्षेत्र के कुछ अरब देशों के सहयोग से ईरान के समक्ष चुनौती खड़ी करने का प्रयास किया परंतु वे अपने लक्ष्य में सफल न हो सके क्योंकि ईरानी राष्ट्र दुश्मनों के षडयंत्रों का सामना करने की पूरी शक्ति रखता है।