27 दिसंबर 2018 - 17:58
अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका पर भरोसा करने के लिए कोई तैयार नहीं, तालेबान ने याद दिलाया सोवियत संघ का अंजाम

अमरीका 17 साल बाद अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की योजना बना रहा है। अमरीकी सरकार ने इस प्रकार के संकेत दिए हैं कि वह अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अपने 14 हज़ार सैनिकों में से कम से कम 7 हज़ार सैनिकों को वापस बुलाने का इरादा रखती है।

एक तरफ़ अमरीका सैनिकों को वापस बुला रहा है तो दूसरी तरह तालेबान से अमरीका की बातचीत भी हो रही है। हाल ही में अबू धाबी में तालेबान और अमरीका के प्रतिनिधिमंडलों के बीच वार्ता हुई। अमरीका ने तालेबान से बातचीत के लिए जब अफ़ग़ान मूल के अमरीकी कूटनयिक ज़लमई ख़लीलज़ाद को नियुक्त किया तो उसी समय टीकाकारों ने लिखना शुरू कर दिया था कि वाशिंग्टन सरकार अब तालेबान से बातचीत की दिशा में बढ़ना चाहती है क्योंकि उसे भी यक़ीन हो चुका है कि अफ़ग़ानिस्तान के मोर्चे को वह सैनिक मार्गों से जीत नहीं पाएगी।

अमरीका तालेबान से वार्ता कर रहा है तो इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं है कि उसने अफ़ग़ानिस्तान को पूरी तरह छोड़ देने का इरादा कर लिया है। अमरीकी सरकार इस कोशिश में है कि किसी भी तरह अफ़ग़ानिस्तान में उसकी पैठ बन जाए। इसके लिए चाहे तालेबान से बातचीत के माध्यम से कोई रास्ता निकले या फिर दाइश जैसे संगठनों की मदद से कोई उपाय खोजा जा सके।

यह बात अफ़ग़ानिस्तान में अब बहुत से गलियारे कह रहे हैं कि अमरीका ही दाइश के नाम से कुछ गुटों को अफ़ग़ानिस्तान में प्रयोग कर रहा है और चूंकि दाइश अपनी दरिंदगी की वजह से जाना जाता है अतः अमरीकी सरकार दाइश के ख़ौफ़ को अफ़ग़ान सरकार के ख़िलाफ़ भी प्रयोग करना चाहती है और तालेबान के बीच फूट डालने के लिए भी इस संगठन को इस्तेमाल करने की कोशिश में है।

अमरीका की इस साज़िश की ओर से अफ़ग़ानिस्तान के भीतर मौजूद सभी पक्ष होशियार हैं जबकि क्षेत्रीय देशों को भी यह अनुमान है कि अमरीका अब अफ़ग़ानिस्तान में कोई नया खेल शुरू करने की कोशिश में है।

वैसे तो अमरीकी सरकार ने अफ़ग़ान सरकार और तालेबान के बीच बातचीत के विषय में खुद को मध्यस्थ के रूप में रखने की कोशिश की है और इसी लिए अबू धाबी में होने वाली वार्ता में अफ़ग़ान सरकार और इसके साथ ही पाकिस्तान, सऊदी अरब और इमारात के प्रतिनिधिमंडलों को भी बुलाया गया है लेकिन चूंकि अमरीका की नीयत पर किसी को भरोसा नहीं है इसलिए काबुल सरकार भी चाहती है कि तालेबान से बातचीत का कोई और चैनल होना ज़रूरी है।

इस संदर्भ में इस्लामी गणतंत्र ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली शमख़ानी का बयान महत्वपूर्ण है। अली शमख़ानी ने काबुल दौरे के अवसर पर घोषणा की कि इस्लामी गणतंत्र ईरान ने तालेबान से कई बार संपर्क किया है और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि अफ़ग़ान सरकार को विश्वास में लेकर ईरान इस विषय पर काम कर रहा है और इसका उद्देश्य तालेबान को वार्ता और शांति के लिए तैयार करना है।

इससे भी साफ़ हो जाता है कि काबुल सरकार को अमरीका के माध्यम तालेबान के साथ होने वाले संपर्क और बातचीत पर भरोसा नहीं है।

इसी बीच तालेबान के बयान से यह साबित होता है कि अबू धाबी में अमरीका से बातचीत के बावजूद तालेबान को अमरीका पर भरोसा नहीं है। तालेबान ने अपने बयान में कहा है कि यदि अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सारे सैनिकों को वापस न बुलाया तो उसका अंजाम भी पूर्व सोवियत संघ जैसा होगा।

तालेबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने अंग्रेज़ी, पश्तो और दरी भाषाओं में एक बयान जारी करके कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ के अंजाम को मद्दे नज़र रखकर पाठ लो और अफ़ग़ानिस्तान की क्षमताओं को परखने की कोशिश न करो।

17 साल बाद जब अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला रहा है तो हालत यह है कि इस देश में कोई भी पक्ष अमरीका पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है क्या यह अमरीकी मिशन की भारी नाकामी नहीं है?!