28 अगस्त 2018 - 14:44

अपेक्षा के अनुसार अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय अदालत की योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्ष 1955 के समझौते के हनन के संबंध में अमरीका के ख़िलाफ़ की शिकायत की समीक्षा करने का अधिकार अंतर्राष्ट्रीय अदालत को नहीं है।

अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने ईरान द्वारा अमरीका के ख़िलाफ़ दायर किए गए मुक़द्दमे की सुनवाई करके अमरीका की राष्ट्रपति संप्रभुता पर प्रहार किया है। इस मामले में अमरीका की कील जेनीफ़र न्यूस्टेड ने कहा कि ईरान एसा कोई आधार नहीं पेश कर सकता जिसे बुनियाद बनाकर यह अदालत ईरान के मुक़द्दमे की सुनवाई करे। वकील ने दावा किया कि ईरान अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरे उत्पन्न कर रहा है इसीलिए अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ किए गए परमाणु समझौते से बाहर निकलने की घोषणा कर दी।

वर्ष 1955 में ईरान और अमरीका के बीच हुए समझौते में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि जिन बातों का संकल्प दोनों देश कर रहे हैं उनमें से किसी के भी विवरण के बारे में मतभेद उत्पन्न होने की स्थिति में दोनों में से कोई भी पक्ष अंतर्राष्ट्रीय अदालत में जा सकता है या फिर दोनों पक्षों के बीच सहमति हो जाए कि वह किसी अन्य मार्ग से शांतिपूर्ण ढंग से अपने मतभेदों का समाधान खोज लेंगे।

इस समझौते के आधार पर ईरान ने अमरीका की सरकार को दो औपचारिक पत्र लिखे और इन पत्रों में अमरीका की ओर से ईरान पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को समझौते में किए गए संकल्प का खुला उल्लंघन ठहराया। बहरहाल अमरीका ने अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों और अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह नज़र अंदाज़ करते हुए इन पत्रों का जवाब नहीं दिया। इसीलिए ईरान अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय अदालत में चला गया।

इससे पहले 1980 के दशक में तेहरान में अमरीकी दूतावास पर छात्रों का क़ब्ज़ा हो जाने के मामले में अमरीका ने इसी समझौते को आधार बनाकर अंतर्राष्ट्रीय अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था मगर अदालत से कोई फ़ैसला आने से पहले ही अलजीरिया घोषणा पत्र जारी करके दोनों पक्षों ने इस विवाद का समधान कर लिया था। इसी दशक के अंत में फ़ार्स खाड़ी में ईरान की तेल जेटियों पर अमरीका के हमले के बाद ईरान ने अंतर्राष्ट्रीय अदालत में शिकायत की थी और अदालत इस मामले को सुनने के लिए तैयार हो गई थी।

इसलिए अमरीका का यह दावा सरासर झूठ है कि अदालत के पास इस मुक़द्दमे की सुनवाई करने का क़ानूनी आधार नहीं है। दूसरी बात यह है कि ईरान पर पुनः प्रतिबंध लगाकर अमरीका 1955 के समझौते के कई अनुच्छेदों का हनन कर रहा है।

ईरान ने परमाणु समझौते पर पूरी तरह अमल किया है अतः अमरीका यह दावा नहीं कर सकता कि ईरान की ओर से परमाणु समझौते का उल्लंघन किया गया है।