इमाम हसन अ.स ने मुआविया से जिन शर्तो पर सुलह की उनसे सिर्फ़ नाम मात्र का शासक रह गया, उसने अपने इस संधि को अधिक महत्व नहीं दिया इस कारण करबला नामक स्थान में एक जंग हुई थी जो मुहम्म्द स्० के नाती तथा यजीद इब्ने मुआविया इब्ने अबूसुफ़यान के बीच हुआ उसमें वास्तव मे जीत इमाम हुसैन अ० की हुई।इमाम हुसैन (अस) के आंदोलन के नतीजेः1. बनी उमैया के वह धार्मिक साज़िश छिन्न भिन्न हो गई जिनके आधार पर उन्होंने अपनी सत्ता को शक्ति प्रदान की थी। 2. बनी उमैया के उन शासकों को शर्मिंदा होना पडा जो हमेशा इस बात के लिए तत्पर रहते थे कि इस्लाम से पहले के मूर्खतापूर्ण प्रबन्धो को क्रियान्वित किया जाये।3. कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अस) की शहादत से मुसलमानों के दिलों में यह चेतना जागृत हुई कि हमने इमाम हुसैन (अस) की सहायता न करके बहुत बड़ा गुनाह किया है। इस चेतना से दो चीज़ें उभर कर सामने आईं एक तो यह कि इमाम की सहायता न करके जो गुनाह (पाप) किया उसका परायश्चित होना चाहिए। दूसरे यह कि जो लोग इमाम की सहायता में बाधक बने थे उनकी ओर से लोगों के दिलो में नफ़रत व द्वेष उत्पन्न हो गया। इस गुनाह के अनुभव की आग लोगों के दिलों में निरन्तर भड़कती चली गयी। तथा बनी उमैया से बदला लेने व अत्याचारी शासन को उखाड़ फेकने की भावना प्रबल होती गयी।अतः तव्वाबीन समूह ने अपने इसी गुनाह के परायश्चित के लिए आंदोलन किया। ताकि इमाम की शहादत का बदला ले सकें।4. इमाम हुसैन (अ.स) के आंदोलन ने लोगों के अन्दर अत्याचार का विरोध करने के लिए रूह फूँक दी। इस तरह इमाम के आंदोलन व कर्बला के खून ने हर उस बाँध को तोड़ डाला जो इन्क़िलाब के रास्ते में रूकावट था।5. इमाम के आंदोलन ने जनता को यह शिक्षा दी कि कभी भी किसी के सम्मुख अपनी इंसानियत को न बेचो। शैतानी ताकतों से लड़ो व इस्लामी सिद्धान्तों को क्रियान्वित करने के लिए प्रत्येक चीज़ को नयौछावर कर दो।6. समाज के अन्दर यह नया नज़रिया पैदा हुआ कि अपमानजनक ज़िंदगी से सम्मानजनक मौत बेहतर है।पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के बाद इस्लामी समाज समाज में यहाँ तक परिवर्तन आ गया था कि मुसलमानों ने अपने पैग़म्बर के परिवार ही पर अत्याचार शुरू कर दिया, इमाम हुसैन अ.ह पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. को सम्बोधित करते हुए फ़रमाते हैः नाना आपके बाद आपकी उम्मत ने माँ फातिमा (स:अ) पर इतना ज़ुल्म ढाया की मेरा भाई उनके कोख में ही मर गया, मेरी माँ और आपकी बेटी पर जलता हुआ दरवाज़ा गिराया गया और उन्हें मार दिया गया। नाना आपकी उम्मत ने बाबा अली (अ:स) को मस्जिद में नमाज़ के सजदे में क़त्ल किया। मेरे भाई हसन (अ:स) को ज़हर देकर मार दिया गया नाना। उसके जनाज़े पर तीरों की बारिश की गयी, फिर भी मैं खामोश रहा। ऐ नाना, मैंने अल्लाह के दीन को आप से किये गए वादे के अनुसार कर्बला के मैदान में अपने तमाम बच्चों, साथियों और अंसारों की क़ुर्बानी देकर बचा लिया। नाना, मेरे 6 महीने के असग़र को तीन दिन की प्यास के बाद तीन फल का तीर मिला । मेरा बेटा अकबर, जो आप का हमशक्ल था, उसके सीने में ऐसा नैज़ा मारा गया की उसका फल उसके कलेजे में ही टूट गया । मेरी बच्ची सकीना को तमाचे मार-मार कर इस तरह से उसके कानो से बालियाँ खींची गयी के उसके कान के लौ कट गए। ऐ नाना, बाबा की दुआओं की तमन्ना मेरा भैय्या अब्बास, जो हमारे कबीले के चमकते चाँद की तरह था, उसको इतने टुकड़ों में काटा गया की उसकी लाश को खैमे तक नहीं लाया जा सका । ऐ नाना, भाई हसन का बेटा क़ासिम, इस तरह से घोड़ों की टापों से रोंदा गया की उसके जिस्म का एक एक टुकड़ा मक़तल में फैल गया। नाना, आप की उम्मत ने मुझे भी ना छोड़ा। मुझे प्यासा रख़ा नाना । अंसार, अज़ीज़ और बेटों के शहादत के बाद मै तेरे दीन को बचाने की ख़ातिर कर्बला के उस तपते हुए रेगिस्तान में गया, जहाँ मैंने अकबर, असग़र, अब्बास वा कासिम को भेजा था । नाना, तेरी उम्मत, दादा अबू तालिब को काफिर कहती थी, लेकिन कर्बला के मैदान में अल्लाह का दीन बचाने के लिए कटी औलादे अबूतालिब ही ना। मैंने अल्लाह का, आप का और बाबा अली-मुर्तज़ा का नाम लेकर उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन वोह न माने। जब निदा के बाद मैंने अपनी तलवार म्यान में रखी तो पहले लोगों में मुझ पर पत्थर मारे, फिर नैज़े, फिर तलवारें, नाना मुझे जब यह ज़ालिम मार रहे थे तो मैंने आपको, माँ फातिमा, बाबा अली, और भाई हसन को बहुत याद कर रहा था। नाना, सच तो यह है की अम्मा बहुत याद आयीं। नाना मुझे इतने तीर लगे थे की जब मै घोड़े से ज़मीन पर ग़िर रहा था, मै भी भाई अब्बास की तरह हाथ के बल ना आ सका. बल्कि तीर इतने थे नाना की मै ज़मीन पर ही नहीं आ सका । जालिमों ने मेरी उंगली काट कर अंगूठी उतार ली नाना । कोई आप का अमामा ले गया कोई पैराहन ले गया। नाना, जब शिम्र ज़िल जौशन मेरा सर काट रहा था, मेरी अम्मा ने बचाने की बहुत कोशिश की थी। प्यास की शिद्दत, कुंद छुरी, उलटी गर्दन, 1900 ज़ख़्म नाना। नाना, मैने अपना सर नोके नैज़ा पर चढ़ा कर तेरे दीन की जीत का ऐलान किया। नाना ख़ुदा हाफ़िज़, अब मेरी जैनब व उम्मे कुलसूम की चादर का ख्याल तेरे हवाले, मेरे बीमार सैयदे सज्जाद को जलना से बचाना, नाना। इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेउन।
15 नवंबर 2013 - 20:30
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इमाम हसन अ.स ने मुआविया से जिन शर्तो पर सुलह की उनसे सिर्फ़ नाम मात्र का शासक रह गया, उसने अपने इस संधि को अधिक महत्व नहीं दिया इस कारण करबला नामक स्थान में एक जंग हुई थी जो मुहम्म्द स्० के नाती तथा यजीद इब्ने मुआविया इब्ने अबूसुफ़यान के बीच हुआ उसमें वास्तव मे जीत इमाम हुसैन अ० की हुई