16 मई 2013 - 19:30
संयुक्त अरब अमीरात भी ईरान के खिलाफ इस्राईल से हाथ मिला रहा है।

पिछले कुछ महीनों से मध्य पूर्व में होने वाली तब्दीलियों और नित नई वुजूद में आ रही गुट बंदियों में सीरिया संकट की मुख्य भूमिका रही है। इसी सिलसिले में इस्लामी प्रतिरोध के असद सरकार के बचाव के लिए संगठित होने के कारण अरब शाही हुकूमतें ज़ायोनी शासन के दामन में पनाह लेती नजर आ रही हैं....

पिछले कुछ महीनों से मध्य पूर्व में होने वाली तब्दीलियों और नित नई वुजूद में आ रही गुट बंदियों में सीरिया संकट की मुख्य भूमिका रही है। इसी सिलसिले में इस्लामी प्रतिरोध के असद सरकार के बचाव के लिए संगठित होने के कारण अरब शाही हुकूमतें ज़ायोनी शासन के दामन में पनाह लेती नजर आ रही हैं।ताबनाक की रिपोर्ट के अनुसार जहां क़तर सरकार लम्बे समय से नियमित और खुल्लम खुल्ला इस्राईल से संबंध स्थापित करने में लगी है और क़तरी और ज़ायोनी अधिकारियों में बातचीत भी हो चुकी हैं, वहीं अब संयुक्त अरब अमीरात की इस्राईल से संबंध स्थापित करने की गोपनीय कोशिशों के रिपोर्टें मिल रही हैं।इस संबंध में इस्राईली दैनिक हाआरतेस ने लिखा है कि मुल्क के बजट की समीक्षा किये जाने से पता चल रहा है कि बेंयामिन नियतेन याहू सरकार ने खाड़ी के एक शाही मुल्क में अपना ऑफ़िस बनाया है जिसके लिए 2010 से बजट अलग किया जा रहा है। हाआरतेस के अनुसार इस ऑफ़िस में 2012 की दूसरी छमाही से काम शुरू हो चुका है और अब 2013 और 2014 के बजट में इसके लिए राशि आवंटित की गई है।बजट में हालांकि ऑफ़िस किस जगह है इसका बयान नहीं है, लेकिन इस न्यूज़पेपर के अनुसार इसके संयुक्त अरब अमीरात में होने की ज़्यादा संभावना है। हाआरतेस के इस खुलासे पर इसराइली विदेश मंत्रालय ने कहा है कि हम किसी भी तरह की प्रतिक्रिया से मजबूर हैं, ग़ौरतलब है कि इस तरह के गुप्त मामलों में इस्राईली अधिकारियों का यह कहना इस ऑफ़िस के होने की पुष्टि करती है।इसराइली दैनिक आगे चलकर लिखा है कि इस्राईल और खाड़ी की तानाशाही हुकूमतों के बीच सम्बंध बहुत संवेदनशील है, जर्मनी में इस्राईल के पूर्व राजदूत तथा क़तर में ज़ायोनी शासन के प्रतिनिधि रह चुके यअकूव हादास ने फरवरी 2010 में इस्राईली नेशनल स्टडी रिसर्च सेंटर के लिए लिखे अपने एक लेख में इस विषय पर रौशनी डालते हुए कहा कि इस्राईल और खाड़ी के शाही देशों के बीच बहुत से संयुक्त आर्थिक और राजनीतिक हित पाये जाते हैं।उल्लेखनीय है कि संयुक्त अरब अमीरात और इस्राईल के बीच न केवल पहले कभी भी संबंध नहीं रहे हैं बल्कि कुछ साल पहले दुबई के एक होटल में हमास सैन्य शाखा के एक वरिष्ठ अधिकारी महमूद अब्दुर रऊफ़ की हत्या पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। दुबई पुलिस प्रमुख ज़ाही खल्फ़ी ने कई बार इस हत्या में इस्राईली इंटिलीजेंस मोसाद को शामिल बताया और यह पता चला कि ज़ायोनी शासन ने धोखे से मोसाद के दर्जनों एजेंट दुबई में दाखिल किए हैं लेकिन कुछ समय बाद विवाद खत्म हो गया और उसके बाद अमीरात ने उक्त राजनीतिक हत्या की जांच के नतीजे का कोई जिक्र नहीं किया।इससे पहले इस्राईल ने क़तर में अपने प्रतिनिधि कार्यालय की स्थापना के पहले चरण के रूप में इस देश में अपना एक छोटा सा मिशन भेज रखा था लेकिन कुछ समय बाद 2009 में मिशन के असंतोषजनक प्रदर्शन के मद्देनजर यह सिलसिला थम गया।इससे वर्षों पहले 1996 में इस्राईल ने बहुत ही कम समय के लिए ओमान की राजधानी मस्कट में इसी तरह का एक कार्यालय स्थापित किया था लेकिन उसे एरियल शेरोन के शासनकाल में फिलिस्तीन से संघर्ष शुरू होने पर बंद कर दिया गया इससे पंद्रह वर्ष पहले भी इस्राईल और ओमान के बीच कुछ गोपनीय सम्बंध रह चुके थे।अरब राजाओं में एकमात्र अमीरे कतर ही हैं जो खुल्लम खुल्ला इस्राइली अधिकारियों से मुलाकात करते है, शमऊन प्रेज़ और तज़ीपी लियोन ने दोहा और न्यूयॉर्क में क़तर के अमीर और प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी।विकीलीक्स के खुलासे के अनुसार इस्राइली राजनयिकों ने एक समय में अमेरिकी अधिकारियों से कहा था कि इस्राईल के पूर्व विदेश मंत्री तज़ीपी लियोन के अपने इमाराती समकक्ष के साथ घनिष्ठ संबंध हैं और संयुक्त अरब अमीरात और दूसरे खाड़ी देशों का मानना है कि वह ईरान के मुक़ाबले में हमेशा इस्राईल पर भरोसा कर सकते हैं।विकीलीक्स के अनुसार एक इस्राईली राजनयिक ने अपने अमेरिकी समकक्ष से यहां तक कह दिया था कि शाही देशों का मानना है कि इस्राईल जादू करके उन्हें ईरान से पैदा खतरों से सुरक्षित रख सकता है।विकीलीक्स के प्रमाणपत्र बताते हैं कि बहरैन के विदेश मंत्री ने भी 2005 में एक बैठक के दौरान अमेरिकियों से कहा था:'अभी कल ही मेरी इलाक़े में इस्राईल के गश्ती राजदूत ब्रूस शाकदोन से मुलाकात हुई है और आप लोग जानते ही होंगे कि हम लोगों के लम्बे समय से आपस में खुफिया संबंध हैं।'बहरहाल इस्राइली दैनिक हाआरतेस की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार ज़ायोनी शासन और खाड़ी के साम्राज्यवादी देशों में संबंधों की पर्दा पोशी के बावजूद इस्राईल को 2010 में कम से कम एक देश द्वारा जो संभवतः संयुक्त अरब अमीरात है खाड़ी देशों में घुसपैठ का परवाना मिल चुका है।यहाँ इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि पिछले दो वर्षों में इलाक़े में महत्वपूर्ण तब्दीलियाँ हुई हैं, इंक़ेलाबों के नतीजे में जनता की हिमायत खो रहे हैं अरब तानाशाह सीरिया संकट की आग में अपनी रोटियाँ सेंकने में नाकाम रहें हैं और यह संकट लगातार तूल पकड़ता जा रहा है, ऐसे में यह तानाशाह (अपने बचाव के लिए) किसी और रास्ते की तलाश में हैं (जो उन्हें इस्राईल की शरण में नजर आ रहा है)।इस आधार पर सीरिया में असद सरकार को उखाड़ फेंकने में विद्रोही समूहों की विफलता और ईरान और हिज़्बुल्ला की तरफ़ से सीरिया सरकार के समर्थन ने उक्त देशों को दमिश्क से मुक़ाबले के लिए इस्राईल की ओर हाथ फैलाने पर मजबूर कर दिया है ताकि इस तरह अपने हिसाब से इस्लामी प्रतिरोध को तोड़कर इलाक़े का माहौल ईरान के खिलाफ कर दें।लेकिन यह देश इस बात पर विचार कर रहे हैं कि उनके और ज़ायोनी शासन के बीच कोई मेल नहीं खाता और सच्चाई यह है कि अगर क्षेत्र में इस्लामी प्रतिरोध कमजोर पड़ गया और इस्राईल को सिर उठाने का मौका मिल गया तो अगले चरण यह आतंकी राज्य पूरे क्षेत्र पर अपना सिक्का जमाने के लिए उन्हीं शाही देशों को निशाना बनाएगा।