फ़िरंगी महल के उल्मा का हमेशा तरीक़ा रहा है कि वह एक दूसरे के साथ मिलजुल कर रहने की शिक्षा देते रहे हैं। जो ताक़तें इस्लाम, इंसानियत, एकता, और शान्ति के लिए ख़तरा बन जाएं फ़िरंगी महल के उल्मा उनके ख़िलाफ़ कभी भी चुप नही रहते। हमारा यह एतिहासिक शहर लखनऊ वह शहर है कि जहां बहुत पुराने समय से शिया व सुन्नी दोनो गुटों के लोग आपस मे मिलजुल कर रहते थे और रबीउलअव्वल व मोहर्रम के महीने मे मिलजुल कर रसूलुल्लाह (स.अ) और आले रसूल (अ.) की याद मनाते थे। इसकी वजह यह है कि दोनो ही समुदाय अल्लाह ताला, रसूलुल्लाह (स), और क़ुरआन के मानने वाले हैं और ख़िलाफ़त के विषय के अलावा किसी और बात पर उनका कोई ख़ास मतभेद नही है। चाहे इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम शाफ़ेई, इमाम मालिक और इमाम हम्बल के मानने वाले अहले सुन्नत हों या फिर बारह इमाम के मानने वाले शिया हज़रात हों, दोनों के यहां अल्लाह के वलियों का सम्मान किया जाता था और आज भी किया जाता है। लेकिन जैसे ही 260 साल पहले पैदा होने वाली वहाबी सोच ने हिन्दुस्तान मे क़दम रखा तो दोनों इस्लामी गुटों के बीच झगड़ा और दूरियां बढ़ने लगीं। वहाबियत को मानने वालों ने रिसालत और अल्लाह के वलियों के अपमान से भरी हुई, मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब नजदी की किताब “अल-तौहीद” और ‘इसमाईल देहलवी’ की किताब “तक़वियतुल ईमान” को जैसे ही मुसलमानों के बीच प्रस्तुत किया तो आपस का भाईचारा टुकड़े-टुकड़े होने लगा। यह वही वहाबी सोच थी जिसे अंग्रेज़ों ने ख़िलाफ़ते उस्मानिया को समाप्त करने के लिए पैदा किया था और क्योंकि उस समय हमारे मुल्क मे अंग्रेज़ों की ही हुकूमत थी इस लिए अंग्रेज़ों ने ख़ास मे भी वहाबियत को आगे बढ़ाने की कोशिश की और फिर मुसलमानों के बीच छिपे हुए अंग्रेज़ी एजेन्टों ने 14 अप्रैल 1932 ई को लखनऊ शहर मे मस्जिदे नदवतुलउलूम की नींव भी अंग्रेज़ गवर्नर से ही रखवाई और फिर उसका बढ़चढ़ कर स्वागत भी किया और उसके बाद से ही हिन्दुस्तान मे वहाबियत की जड़ें मज़बूत होने लगीं। और अब तो ईसाई, यहूदी और सऊदी गठजोड़ मिलजुल कर दुनिया के दूसरे मुल्कों की तरह हिन्दुस्तान मे भी बड़े ही ज़ोर शोर से इस तालेबानी सोच को सऊदी अरब के पैसों पर चलने वाले मदरसों के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है। जिसका नतीजा तालेबान और अलक़ायदा जैसे आतंकवादी संगठन हैं। इन मदरसों मे आज भी “अलतौहीद” और “तक़वियतुल ईमान” जैसी किताबें पढ़ाई जा रही हैं और इसी तरह के मदरसों से शिक्षा पाकर निकलने वाले लोग ही दरगाहों, मज़ारों, ख़ानक़ाहों और इमामबारगाहों आदि को शिर्क और बुतपरस्ती का अड्डा कहते हैं, और जुलूसों, मीलाद की महफ़िलों, या मजलिसे अज़ा को शिर्क व बिदअत कहकर बन्द कराना और दीन के ख़िलाफ़ काम समझते हैं और यही कारण है कि इस सोच के लोग पूरी दुनिया मे जुलूसों, दरगाहों, इमाम बारगाहों, मीलाद शरीफ़ और नाते पाक की महफ़िलों के साथ-साथ मजलिसे अज़ा आदि पर हमला करते रहते हैं। 16 जनवरी 2013 को मोहल्ला वज़ीर गंज शहर लखनऊ मे डिप्टी साहब की इमाम बारगाह पर होने वाला हमला भी वहाबी सोच के लोगों ने किया था, जिसमे दो बेगुनाह लोगों की हत्या कर दी गई और बहुत से लोग घायल हो गए थे इसके बाद भी तथाकथित क़ौम के लीडर और वहाबी उल्मा या तो हत्यारों की तरफ़दारी कर रहे हैं या फिर चुप रहकर तमाशा देख रहे हैं। और सच कहने से बच रहे हैं, जबकि क़ुराने मजीद मे साफ़-साफ़ कहा गया है कि हक़ बात कहो और नेकियों मे एक दूसरे के मददगार बनो और ख़बरदार बुराईयों मे किसी के मददगार न बनना क़ुरान ने हत्या करने और करवाने वाले की या हत्यारों की मदद करने वालों की निन्दा की है और कहा है कि जो लोग किसी गुनहगार का साथ देते हैं ख़ुद भी गुनहगार हैं और जिस किसी ने किसी बेगुनाह की हत्या की उसने पूरी इंसानियत की हत्या की लेकिन इसके बावजूद भी कुछ लोग क़ातिलों और ज़मीन पर आतंक फैलाने वालों के मददगार बनकर खुलेआम क़ुरान का विरोध कर रहे हैं, जबकि इनको चाहिए था कि ज़ालिम की नही बल्कि मज़लूम की मदद करते लेकिन यह लोग मज़लूमो की नही बल्कि ज़ालिमों की मदद कर रहे हैं। एक बात और सोचने की है की वहाबी सोच के लोग कभी भी अपने आप को वहाबी नही कहते बल्कि यह लोग अहलेसुन्नत की खाल पहन कर अपने काम को पूरा करते हैं और अहलेसुन्नत को बदनाम करते हैं। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज वहाबी सोच के लोगों ने ही पैसों के बल पर बहुत से बिकाउ उल्मा और इस्लामी विचारकों की ज़बान और क़लम भी ख़रीद लिए हैं जिसमे वह आदमी भी शामिल है जो हर समय वहाबियों का वकील बना रहता है और अपने नाम के आगे फ़िरंगी महली लगाकर फ़िरंगी महल के नाम को बदनाम कर रहा है। आज पूरी दुनिया मे वहाबी शरारत के कारण ही झगड़े हो रहे हैं जिसे शिया सुन्नी झगड़े का नाम दिया जा रहा है। जबकि आज तक न तो किसी शिया ने नाते पाक या मीलाद शरीफ़ की महफ़िल पर कोई हमला किया है और न ही किसी सुन्नी ने किसी इमाम बारगाह या अज़ादारी के किसी जुलूस पर कोई हमला किया है बल्कि न्यूज़ पेपर और टीवी चैनल इस बात के गवाह हैं कि लगभग हर दिन ही दुनिया भर मे कहीं न कहीं इसी वहाबी और तालिबानी सोच के लोग बेगुनाह लोगों की हत्याएं करते रहते हैं। जबकि शिया और सुन्नी दोनो ही गुट रबीउलअव्वल और मोहर्रम के महीने मे मिलजुल कर पूरी दुनिया मे अपने अपने तरीक़े से मीलाद शरीफ़ या शहीदाने कर्बला की याद मनाते हैं, मगर वहाबी सोच के लोग ताज़ियेदारी, अज़ादारी, नज़र व नयाज़, फ़ातेहा दुरूद, मीलाद शरीफ़ और शहीदाने कर्बला के ग़म मनाने को हराम समझते हैं, और इसी लिए वह लोग ऐसी जगहों पर बराबर हमला करते रहते हैं। लखनऊ मे अभी हालिया दिनों मे ही मजलिसे अज़ा और सीरते पाक के जलसे पर होने वाले हमले इस बात का सुबूत हैं। इन्टरनेश्नल लेविल पर अगर सोच विचार किया जाए तो इस समय भी सऊदी अरब और उसके दोस्त तथाकथित इसलामी देश ही शिया सुन्नी लड़ाई करवाना चाहते हैं। और वह ताज़िएदारी और अज़ादारी के साथ साथ मीलाद शरीफ़ और जुलूसे मोहम्मदी के पक्के दुश्मन हैं और इसी लिए वहाबी और वहाबी मुफ़्तियों ने भी इसे हराम कहकर तरह तरह के फ़तवे दिए हैं। ख़ानए काबा मे मक़ामे इबराहीम के पास होने वाले जश्ने मीलादुन्नबी (स) और वहां से निकलने वाले जुलूसे मोहम्मदी को भी 1920 ई मे सउदी हुकूमत ने पूरी तरह बन्द करा दिया। और अब तो पूरे सउदी अरब मे न तो रबीउलअव्वल मे रसूलुल्लाह (स) के जन्म के दिन कोई छुट्टी होती है और न ही 10 मोहर्रम को ही छुट्टी दी जाती है। इसके अपोज़िट अगर देखा जाए तो ईरान जो एक शिया मुल्क है वहां पर हर साल रबीउलअव्वल के महीने मे रसूलुल्लाह (स) की पैदाईश के अवसर पर यूनिटी वीक अर्थात हफ़तए वहदत मनाया जाता है और एक हफ़ते तक शिया और सुन्नी दोनो मिलजुल कर रसूलुल्लाह (स) के शुभ जन्म का जश्न मनाते हैं, और ईरान ही वह इकलौता मुल्क है कि जहां पर आज तक शिया और सुन्नी दंगे नही हुए और दोनो गुट (शिया सुन्नी) वहां पर आपस मे मिलजुल कर रहते हैं। 1979 ई मे जब ईरान मे इस्लामी इन्क़ेलाब आया तो इमाम ख़ुमैनी ने ही शिया और सुन्नी दोनो से एक होकर क़िबलए अव्वल बैतुलमुक़द्दस को आज़ाद कराने की अपील की। लेकिन आज तक इमाम काबा ने कभी भी शिया सुन्नी एकता की कोई अपील नही की और न ही बैतुलमुक़द्दस को आज़ाद कराने की कोशिश की और शाहे ईरान की हुकूमत समाप्त होते ही इमाम ख़ुमैनी ने फ़िलिस्तीनियों की सहायता करने का जो एलान किया था वह आज तक चल रहा है। यही कारण है कि इमाम ख़ुमैनी की आवाज़ पर हर साल रमज़ान के मुबारक महीने के अन्तिम जुमे को यौमुलक़ुद्स मनाया जाता है। और फ़िलिस्तीन की आज़ादी की आवाज़ उठाई जाती है। अगर देखा जाए तो फ़िलिस्तीन मे सुन्नी बहुसंख्यक हैं और वहां पर शि
2 मई 2013 - 19:30
समाचार कोड: 415650
फ़िरंगी महल के उल्मा का हमेशा तरीक़ा रहा है कि वह एक दूसरे के साथ मिलजुल कर रहने की शिक्षा देते रहे हैं। जो ताक़तें इस्लाम, इंसानियत, एकता, और शान्ति के लिए ख़तरा बन जाएं फ़िरंगी महल के उल्मा उनके ख़िलाफ़ कभी भी चुप नही रहते....