यूरोपीय मुल्क ईरान को खतरा जाहिर करके संकट पैदा करते हैं और उसके बाद वह तथाकथित खतरे को दूर करने के लिए इलाक़े के अरब मुल्कों के साथ हथियार बिक्री के लाभकारी समझौते करके अरबों डॉलर कमा लेते हैं। वाशिंगटन टाइम्स ने अपने ताजा अंक में ऐसे ही कुछ समझौतों की ओर इशारा करते हुए लिखा है कि अमेरिका फ़ार्स की खाड़ी के अरब देशों को जो हथियार बेच रहा है वह अतिक्रमण के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एरिये में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत अमेरिका के दूसरे घटक दलों की संभावित जंग केवल ईरान के साथ होगी क्योंकि यह संभावना पाई जाती है कि इलाक़े के मुल्क ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को निशान बनाने के लिए अमेरिका के हवाई हमले में हिस्सा लेंगे। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सेनारियो के पीछे यह सोच काम कर रही है कि ईरान अपनी नेशनल सुरक्षा और हितों के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई के जवाब में फ़ार्स की खाड़ी के मुल्कों या कम से कम उन प्रतिष्ठानों को अपने हमलों का निशाना बनाएगा जिन्हें गैर विदेशी ईरान पर हमले के लिए इस्तेमाल करेंगे। जिसके नतीजे में फ़ार्स की खाड़ी के मुल्कों के बीच झगड़ा शुरू हो जाएगा और यह संभावना पाई जाती है कि फ़ार्स की खाड़ी का इलाक़ा इस जंग में उलझ कर रह जाए। इस नज़रिये के आधार पर अमेरिका और यूरोप, इलाक़े में संकट और अशांति पैदा करते हैं और उसके बाद वह इन मुल्कों को तैयार करने के लिए उनके हाथ अपने हथियार बेचते हैं। इस आधार पर इन देशों के हाथ हथियारों की बिक्री सोची समझी स्कीम है। ब्रिटेन से छपने वाले अखबार इंडी पैंडेन्ट ब्रिटेन ने एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कुछ समय पहले लिखा था कि लंदन के अनुसार ईरान के मुकाबले में एरिये के अरब देशों की सुरक्षा के लिए इन देशों के हाथ अपने लड़ाकू विमान Eurofighter Typhoon की बिक्री की समीक्षा कर रहा है। इसी संदर्भ में अमेरिका ने अपना सारा ध्यान फ़ार्स की खाड़ी में अपने सैनिकों और युद्धक उपकरणों में बढ़ोतरी पर लगा रखा है। एरिये के अरब देशों के हाथ हल्के और भारी हथियारों की बिक्री की समस्या दो दशकों से समाप्त न होने वाले मुकाबले में तब्दील हो चुका है। इस संबंध में अजीब बात यह है कि अरब देशों को अधिक हथियार बेचने वाले मुल्क अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन हैं और यही देश इस बात का बवाल मचाते हैं कि ईरान एरिये के लिए खतरा है। हथियारों की दौड़ खासकर मध्य पूर्व में हमेशा से रही है लेकिन ग्यारह सितंबर की घटना के बाद इसमें तेजी आई है और हाल के वर्षों में संयुक्त अरब अमीरात जैसे फ़ार्स की खाड़ी के कुछ मुल्कों ने सैनिक उपकरण खरीदने के लिए पागलपने का प्रदर्शन किया है। संयुक्त अरब अमीरात चीन, भारत और दक्षिण कोरिया के बाद सबसे अधिक हथियार खरीदने वाला चौथा बड़ा देश है। यूरोप ने ईरान फ़ोबिया द्वारा एरिये के अरब देशों को ज़्यादा से ज़्यादा हथियार खरीदने में दिलचस्पी दिलाई है। वह निराधार बहानों से अरब मुल्कों के तेल से कमाई हुई दौलत हासिल कर लेता है और उसके बदले उन्हें ऐसे हथियार देता है अरब देश जिनको इस्तेमाल करना तक नहीं जानते हैं। संयुक्त अरब अमीरात ने तीन साल पहले फ्रांस के लड़ाकू विमान रफ़ाईल की खरीद की बातचीत शुरू की थी जो बेनतीजा रही क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात में इस समय साठ फ्रेंच विमान हैं जो कई सालों से बेकार पड़े हुए हैं। संयुक्त अरब अमीरात से प्रकाशित होने वाले अखबार गल्फ़ न्यूज़ ने हाल ही में यूरोपीय नीतियों को आलोचना का निशाना बनाया था और इस बात की तरफ़ इशारा करते हुए कि यूरोप वालों ने इलाक़े को हथियारों की दौड़ के मैदान में बदल रखा है, गल्फ़ न्यूज़ ने लिखा है कि यूरोपीय मुल्कों ईरान के खतरे के मुक़ाबले के बहाने एरिये के मुल्कों को अपने हथियार बेचते हैं जिसकी वजह से वह एरिये में अशांति का सबसे बड़ा कारण बन चुके हैं और बार बार ईरान को खतरा बताते रहते हैं और उसे दावे के आधार पर एरिये के अरब मुल्कों को ज़्यादा से ज़्यादा हथियार बेचते हैं। ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔ 166
20 दिसंबर 2012 - 20:30
समाचार कोड: 374270
यूरोपीय मुल्क ईरान को खतरा जाहिर करके संकट पैदा करते हैं और उसके बाद वह तथाकथित खतरे को दूर करने के लिए इलाक़े के अरब मुल्कों के साथ हथियार बिक्री के लाभकारी समझौते करके अरबों डॉलर कमा लेते हैं۔۔۔۔۔۔۔