31 दिसंबर 2020 - 18:40
ईरान पर हो रही है चढ़ाई की तैयारी, क्या ईरान इस युद्ध को रोक सकता है? जब इस्राईल पर बरसे थे दस हज़ार मिसाइल... रूसी न्यूज़ एजेन्सी की रिपोर्ट

रूसी न्यूज़ एजेन्सी स्पूतनिक की परशियन सेवा ने ईरान और अमरीका के मध्य जारी तनाव पर एक लेख प्रकाशित किया है जो पढ़ने योग्य है।

आज सारे विशेषज्ञों का यही मानना है कि ट्रम्प की नीतियां, सब को युद्ध की ओर ले जा रही हैं।

     यह भी सब जानते हैं कि ईरानी, युद्ध से दूर रहने की पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन यह भी सच्चाई है कि ईरानियों के संयम की भी सीमा है और अगर इसी तरह इलाक़े में दुश्मन सैनिकों का जमावड़ा होता रहा तो सब के सब बारूद के ढेर पर बैठ जाएंगे जिसमें धमाके के लिए एक चिंगारी ही काफी होगी।

     इस बारुद के ढेर में धमाके से हो सकता है ईरान को नुक़सान पहुंचे लेकिन निश्चित रूप से ईरान के दुश्मनों को बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुंचेगा।

     ईरान, सारी दुश्मनी के बावजूद हो सकता है कि इलाक़े में अमरीका की उपस्थिति को स्वीकार कर ले  लेकिन इस्राईल की उपस्थिति को किसी भी दशा में स्वीकार नहीं कर सकता और इसे अपने लिए एक खतरा समझता है।

     जिस तरह से इस्राईल का यह कहना है कि सीरिया में ईरान की उपस्थिति उसके लिए खतरा है और इस दावे के बल पर वह सीरिया में ईरानी सलाहकारों पर हमले को सही ठहराता है तो उसी तरह ईरान भी अपने निकट इस्राईल की उपस्थिति को खतरा समझता है और इसी वह भी हर उस जगह के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है जहां इस्राईल का झंडा लहरा रहा हो, चाहे वह कोई इमारत हो या फिर कोई जहाज़।

      यह चीज़ परशियन गल्फ के देशों तक ही सीमित नहीं बल्कि ईरान आज़रबाइजान जैसे अन्य देशों में भी अपने लिए खतरा पैदा होने की दशा में इस्राईली हितों को निशाना बना सकता है। बहुत से ईरानियों  का यह मानना है कि इराक और सीरिया व लेबनान में ईरानी सलाहकारों की सुरक्षा  का एकमात्र मार्ग यही है कि जैसे तो तैसे की नीति को लागू किया जाए।

 

     बहुत से लोगों को याद होगा कि एक समय था जब लेबनान के आकाश में इस्राईली विमान जब चाहते थे उड़ान भरते थे और जहां चाहते हमला भी कर देते थे। लेबन सन 2000 में जब लेबनान के हिज़्बुल्लाह आंदोलन ने शक्ति के बल पर इस्राईल को दक्षिणी लेबनान से बाहर निकाला तो उसके बाद भी इस्राईल वही सब कुछ करता रहा लेकिन फिर हिज़्बुल्लाह ने यह नीति अपनायी कि एक मार्टर गोले का एक मार्टर गोले से और दो राकेट का दो से जवाब दिया जाएगा। पहले हिज़्बुल्लाह, इस्राईल के असैनिक ठिकानों पर हमले नहीं करता था लेकिन फिर उसने एलान किया कि इस्राईल अगर लेबनान के असैनिक ठिकाने पर हमला करेगा तो वह भी एसा ही करेंगे, संतुलन बन गया था यहां तक कि 2006 में व्यापक युद्ध हो गया जिसमें इस्राईल ने सोचा था कि बड़ी आसानी से वह सन 1982 की तरह बैरुत तक पहुंच जाएंगे मगर इस बार न केवल यह कि इस्राईल आगे नहीं बढ़ पाया बल्कि पहली बार दसियों टैंक और लोगों से हाथ धो लिया और लगभग दस हज़ार मिसाइल उस पर बरसाए गये जिसके बाद इस्राईली एयरपोर्ट और बंदरगाहें उन लोगों से भर गयीं जो इस्राईल छोड़ कर जाना चाह रहे थे, इस्राईल में कारखाने बंद हो गये, और वह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया था। यह वही युद्ध था जिसके बारे  में कुछ दिन पहले हिज़्बुल्लाह के महासचिव सैयद हसन नसरुल्लाह ने बताया कि उसके हर क्षण की कमान , जनरल कासिम सुलैमानी के हाथ में थी।

     इराक़ में हालात अलग हैं, लेबनान में ईरान को केवल सैयद हसन नसरुल्लाह से समन्वय करना होता है लेकिन इराक़ में कई प्रकार के संगठन सक्रिय हैं और उन सब पर ईरान का नियंत्रण नहीं है।

     इराक़ के सभी गुटों को न ईरान और न ही इराकी प्रधानमंत्री काबू में रख सकते हैं। इन संगठनों ने फैसला कर लिया है कि अमरीकी सैनिकों को इराक़ से निकाल कर रहेंगे। इस लिए अगर इराक़ में अमरीकी हितों पर हमला होता है तो उस पर किसी को हैरत नहीं होना चाहिए अमरीका ने इराक़ में बड़े भयानक अपराध किये हैं जिससे इराक़ के इन गुटों  के सदस्यों  का खून खौल रहा है जिसे ठंडा करना ईरान के हाथ में नहीं है अलबत्ता ईरान अपनी तरफ से युद्ध को रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है लेकिन अमरीका की भड़काऊ नीतियां, हालात को किस तरफ ले जाती हैं उसकी ज़िम्मेदारी ईरान पर नहीं होगी।