8 दिसंबर 2020 - 16:18
इस्राईल पर क्यों भड़के सऊदी राजकुमार? क्या यह गुज़र जाने वाले बादल हैं या गहरे बदलाव के इशारे? क़तर सऊदी अरब संधि से इसका क्या है संबंध?

सऊदी अरब के पूर्व इंटैलीजेन्स चीफ़ और वाशिंग्टन और लंदन में सऊदी अरब के पूर्व राजदूत तुर्की अलफ़ैसल ने बहरैन सम्मेलन में इस्राईल पर बहुत तेज़ हमला कर दिया। तुर्की फ़ैसल के बयान से सऊदी अरब के भीतर भी और इलाक़े के स्तर पर भी लोगों को बड़ा ताज्जुब हुआ।

तुर्की फ़ैसल के इस क्रोध से हमें दाओस सम्मेलन में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोग़ान का ग़ुस्सा याद आ गया जब वह इस्राईल के तत्कालीन राष्ट्रपति शमऊन पैरिज़ पर फट पड़े थे उन पर झूठ बोलने और उनकी सरकार पर बच्चों और महिलाओं की हत्याएं करने का आरोप लगाकर बैठक से चले गए थे जबकि अरब लीग के महासचिव अम्र मूसा अपनी सीट पर बैठे रह गए थे। अलबत्ता हम यह मानते हैं कि दोनों घटनाओं में काफ़ी अंतर है ।

यह समय बड़ा महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह वह समय है जब सऊदी अरब के क़रीबी घटक जैसे इमारात और बहरैन की ओर से इस्राईल के साथ शांति समझौते और दूसरे समझौतों पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं। सब कुछ सऊदी अरब की सहमति से हो रहा है। सऊदी अरब ने अपनी वायु सीमा इस्राईली विमानों के लिए खोल दी है मगर अब इस्राईल के ख़िलाफ़ इतना भारी प्रहार सऊदी अरब के उस राजकुमार ने किया है जो इस्रराईल के साथ वार्ता के चैनल खोलने में आगे आगे था। तुर्की फ़ैसल कई मौक़ों पर इस्राईली अधिकारियों से खुले आम मुलाक़ात कर चुके हैं।

तुर्की फ़ैसल ने जिस प्रकार का बयान दिया है वह हालिया वर्षों में किसी भी सऊदी अधिकारी की ओर से बिल्कुल अलग बयान है। यहां पर यह देखना ज़रूरी है कि इस प्रकार के बयान की क्या वजह हो सकती है। इस बारे में कुछ बिंदुओं की ओर इशारा किया जा सकता है।

एक तो यह कि पश्चिमी देशों के मीडिया में ख़बरें आ रही हैं कि इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू ने सऊदी अरब के ख़ुफ़िया दौरे के बाद इसकी ख़बर मीडिया में लीक कर दी तो इस पर सऊदी अरब की सरकार के बीच भारी नाराज़गी पैदा हो गई। सऊदी क्राउन प्रिंस बिन सलमान चाहते थे कि यह मुलाक़ात ख़ुफ़िया ही बनी रहे। सऊदी विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ने तो मुलाक़ात की रिपोर्टों का खंडन भी किया। बाद में इस्राईली मीडिया में यह ख़बर भी आई कि सऊदी अरब ने इसी नाराज़गी में इस्राईली इंटेलीजेन्स चीफ़ यूसी कोहेन की प्रस्तावित रियाज़ यात्रा रद्द कर दी।

दूसरे यह कि सऊदी अरब के भीतर से ख़बरें आ रही हैं कि इस्राईल से संबंध क़ायम करने के मामले में किंग सलमान और उनके बेटे और क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन समलान के बीच गहरे मतभेद हैं। किंग सलमान को नेतनयाहू के दौरे की ख़बर तक नहीं थी और न उन्हें यह पता चल पाया था कि सऊदी अरब की वायु सीमाएं इस्राईली विमानों के लिए खोल दी गई हैं। तुर्की फ़ैसल इस मामले में किंग सलमान का समर्थन कर रहे हैं।

तीसरी बात यह है कि इस्राईल से समझौते करने वाले देशों विशेष रूप से इमारात के साथ सऊदी किंग के क़रीबी हल्क़े के गहरे मतभेद हैं। तुर्की फ़ैसल ने इस्राईल के साथ किए जाने वाले समझौतों पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि आप खुले हुए घाव को केवल पेन किलर देकर ठीक नहीं कर सकते। इसके जवाब में इमारात के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ाएद के बेहद क़रीबी अधिकारी डाक्टर अब्दुल ख़ालिक़ अब्दुल्लाह ने ट्वीट कर दिया कि इमारात की स्वीकृति के बग़ैर सऊदी अरब और क़तर का समझौता नहीं हो सकता। बाद में उन्होंने यह ट्वीट डिलीट कर दिया।

चौथी बात यह है कि क़तर और तुर्की की ओर बढ़ता सऊदी अरब का झुकाव सऊदी अरब के उन घटक देशों को पसंद नहीं आया है जो क़तर की घेराबंदी करने में सऊदी अरब के साथ थे। यह देश इमारात, बहरैन और मिस्र हैं। सऊदी अरब को लग रहा है कि इस्लामी जगत में उसकी साख ध्वस्त होती जा रही है इसलिए उसने इस्राईल और अमरीका के बारे में कड़े तेवर अपना लिए हैं।

पांचवीं बात यह है कि अमरीका में सऊदी अरब पर हो रहे तेज़ हमलों के पीछे इस्राईल सक्रिय है क्योंकि अमरीकी मीडिया पर यहूदी लाबी का क़ब्ज़ा है। तुर्की फ़ैसल ने इस विषय का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब से दोस्ती करना चाहते हैं लेकिन दूसरी ओर अन्य देशों में अपने राजनैतिक मोहरों और मीडिया के कुत्तों को सऊदी अरब पर हमले के लिए आज़ाद छोड़ देते हैं।

सवाल यह है कि तुर्की फ़ैसला का यह ग़ुस्सा गुज़रते हुए बदल की भांति है या किसी बड़े रणनैतिक बदलाव की शुरुआत। इसका जवाब आने वाले हफ़्तों और महीनों में सामने आएगा।

स्रोतः रायुल यौम