बुधवार की शाम शूराए निगहबान या गार्जियन काउन्सिल की बैठक में इस बिल में किए गए परिवर्तनों के मद्देनज़र समीक्षा की गई और इसे धार्मिक शिक्षाओं व संविधान के विरुद्ध नहीं पाया गया। गार्जियन काउन्सिल के प्रवक्ता अब्बास अली कदख़ुदाई ने इस संबंध में कहा कि इस बिल के छठे बिंदु के बारे में संसद की ओर से किए जाने वाले संशोधन के बाद परिषद ने इसकी पुष्टि कर दी है और अब उसकी नज़र में इसमें संविधान व धर्म की दृष्टि से कोई विरोधाभास नहीं है। उन्होंने कहा कि अब संसद इस क़ानून को क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रपति के पास भेज सकती है। संसद ने पहले इस क़ानून में परमाणु समझौते के पक्षों को अपनी कटिबद्धताओं के पालन के लिए एक महीने का समय दिया था लेकिन फिर उसमें संशोधन करते हुए समयावधि दो महीने की कर दी है।
इससे पहले ईरान के राष्ट्रपति के कार्यालय के प्रमुख महमूद वाएज़ी ने बुधवार को मंत्रीमंडल की बैठक के अवसर पर पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि संसद ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों की समाप्ति और राष्ट्र के हितों की रक्षा के बिल के बारे में विदेश मंत्रालय और सरकार से कोई परामर्श नहीं किया था। उनका कहना था कि वर्तमान स्थिति में यह बिल आर्थिक व तकनीकी क्रियान्वयन की दृष्टि से समस्याएं पैदा करेगा। सरकार ने इस बिल के विरोध में गार्जियन काउन्सिल को पत्र भी भेजा था लेकिन काउन्सिल ने संसद के बिल को मंज़ूरी देकर उसे क़ानून का दर्जा दे दिया है।