अब तक जो जानकारियां सामने आई हैं वह ख़तरनाक इशारे दे रही हैं और यह साबित होता है कि आस्ट्रिया में होने वाला आतंकी हमला अन्य देशों में हालिया दिनों होने वाले हमले से अधिक ख़तरनाक है। इसके कई कारण है।
पहला कारण यह है कि आतंकियों ने इस हमले में चाक़ू के बजाए बंदूक़ का इस्तेमाल किया जो बहुत बड़ा बदलाव है।
दूसरा कारण यह है कि हमले में एक से ज़्यादा हमलावर शामिल हुआ। इससे लगता है कि छोटे आतंकी समूह यूरोपीय देशों में छिपे हुए हैं जिनके संबंध बड़े आतंकी संगठनों से हैं। वियेना हमले से ज़ाहिर है कि इसकी योजनाबंदी की गई थी।
तीसरा कारण यह है कि हमले में शामिल एक युवा को 22 महीने की जेल की सज़ा इसलिए हो चुकी है कि वह सीरिया जाकर दाइश में शामिल होने की कोशिश कर रहा था। इससे लगता है कि दाइश का अंत नहीं हुआ है और इस संगठन ने अपने आतंकियों को यूरोप के भीतर पहुंचा दिया है।
चौथा कारण यह है कि फ़्रांस में टीचर का गला काटने वाला चेचन युवा था जबकि वियेना का हमला मेसीडोनियाई मूल के युवा ने किया है। इसका मतलब यह है कि आतंकवाद का ज़हर प्रवासियों के भीतर ही नहीं बल्कि यूरोपीय देशों के मूल निवासियों में फैल चुका है।
पांचवां कारण यह है कि हमलों की रोक थाम के लिए कठोर नीतियां तो सही हैं लेकिन इनके साथ साथ ही भड़काऊ बयान देना और उत्तेजक बातें करना ख़तरनाक साबित हो रहा है।
छठां कारण यह है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ़ मुसलमानों और इस्लाम के ख़िलाफ़ दुशमनी रखने वालों तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि मुस्लिम निवासियों को भी यह आज़ादी दी जानी चाहिए उन्हें भी आतंकवाद के बुनियादी कारणों के बारे में खुलकर बात करने और पश्चिमी सरकारों की नीतियों की आलोचना करने का मौक़ा मिलना चाहिए।
अलजज़ीरा टीवी चैनल ने मैक्रां का इंटरव्यू किया और उन्होंने अपने विचार रखे तो फ़्रांसीसी मीडिया में किसी मुस्लिम विचारक को मौक़ा नहीं दिया गया कि वह मुसलमानों का पक्ष रखता।
हम अपने इस अख़बार रायुल यौम में हर प्रकार की हिंसा, आतंकवाद और गले काटने की निंदा करते हैं और भाईचारे के जीवन के पक्षधर हैं लेकिन यह भी ज़रूरी है कि यूरोपीय सरकारें हाशिए पर डाल दिए जाने वाले शरणार्थियों के बारे में अपनी नीतियों पर पुनरविचार करें और हर विचारधारा के लिए लोगों को प्लेटफ़ार्म दें। तीस चालीस साल पहले यूरोप में इसी तरह का माहौल होता था और इसीलिए शांति और स्थिरता का राज था। जैसे जैसे यूरोपीय मीडिया एक ख़ास रंग में रंगता गया और केवल इस्लाम और मुसलमानों को निशाना बनाने का सिलसिला शुरू हो गया तो फिर हालात भी बदलने लगे। आतंकी संगठनों की तो आलोचना की जानी चाहिए लेकिन उन सरकारों की भी आलोचना ज़रूरी है जिन्होंने केवल इस्लाम को निशाने पर ले रखा है और इसीलिए उनकी नीतियां भी नाकाम हो रही हैं।
स्रोतः रायुल यौम