قال الرضاؑ:'' کانَ اَبِی اِذَادَخَلَ شَھْرُ الْمُحَرَّمِ لَا یُرَی ضَاحِکَا وَکانْتِ الکَأبَۃُ َتغْلِبُ عَلَیْہِ حَتَیّ یَمْضِی مِنْہُ عَشْرَۃُاَیَّامٍ فَاِذَا کَانَ الْیَومُ الْعَاشِرُ کَانَ ذَلکَ الْیَوْمُ یَوْمَ مُصِیْبَتِہِ وَحُزنِہِ وَبُکَائِہ۔''
इमाम रज़ा अलै. ने फ़रमाया जब मोहर्रम का महीना शुरू हो जाता था तो मेरे बाबा को कोई भी हँसा नहीं पाता था। परेशानी और ग़मो अंदोह की कैफ़ियत आपके ऊपर छाई रहती थी और जब दस दिन गुज़र जाते थे तो फिर दसवें का दिन आपके लिए मुसीबत और ग़मो हुज़्न का दिन और रोने पीटने का दिन होता था।
(अमाली सुदूक़ पेज नं. 111)