योगी सरकार का दावा है कि देश में कहीं ऑक्सीजन की कमी नहीं है और अस्पतालों में भी पर्याप्त बेड मौजूद हैं, और जो लोग सोशल मीडिया पर ऑक्सीजन या बेड के लिए संदेश दे रहे हैं, वे सरकार को बदनाम करना चाहते हैं।
उत्तर प्रदेश के सीएम योगी ने ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्यवाही के आदेश भी दिए है, जिसके बाद अमेठी के शशांक यादव के ख़िलाफ़ ट्वीट द्वारा ऑक्सीजन की गुहार लगाने के आरोप में एफ़आईआर भी दर्ज की गई है।

हालांकि देश में हर रोज़ तीन लाख से अधिक कोरोना के मामले दर्ज किए जा रहे हैं। सीन से सरकार और प्रशासन के पूरी तरह से ग़ायब होने की वजह से लोग ख़ुद को बेबस और असहाय महसूस कर रहे हैं, इसलिए अपने परिजनों तक मदद पहुंचाने के लिए बड़ी बेचैनी से सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं।
शुक्रवार को भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 3,86,452 हो गई और 3,498 लोगों की मौत हुई।
सरकारों के इस रवैये के ख़िलाफ़ अब सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है और कहा है कि सरकार कोविड-19 की सूचनाओं के प्रसार पर शिकंजा नहीं कस सकती है। न्यायालय का मानना है कि नागरिक अपनी शिकायतें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सकते हैं।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहाः अगर कोई नागरिक बेड या ऑक्सीजन चाहता है और उसे परेशान किया जाता है तो हम उसे अवहेलना मानेंगे। हम एक मानवीय संकट में हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर लोगों द्वारा की जा रही सभी शिकायतें और अनुमान ग़लत नहीं हो सकते।
यहां सवाल यह उठता है कि अपने बीमार परिजनों को अस्पताल में बेड, ऑक्सीजन, रेमेडिसविर और प्लाज़्मा दिलाने के लिए लोग अगर सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं, तो उन सरकारों को अब यह फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहें क्यों लग रही हैं, जो अभी तक ख़रगोश की नींद सोई हुई थीं।
स्वास्थ्य प्रणाली के चरमरा जाने के बाद सोशल मीडिया और लोगों की एक दूसरे को मदद ही लोगों के जीवन और मौत को तय कर रही हैं।
अभ नागरिकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस राष्ट्रीय आपदा के बीत जाने के बाद, वह फिर कभी ऐसे अक्षम और अयोग्य लोगों हाथों में देश की लगाम नहीं देंगे और जो लोग देश में मानवीय संकट पैदा करने के लिए ज़िम्मेदार हैं, उनकी जवाबदेही तय होगी।