20 दिसंबर 2020 - 15:16
किसानों ने मोदी को दिखाया आईना, ग़लतफ़हमी दूर करें, तथ्यहीन बातें बंद करें, विपक्ष पर आरोप न लगाएं, एनडीए में टूट फूट शुरु...

भारत में किसानों का आंदोलन पूरी शक्ति के साथ जारी है जबकि किसानों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर कहा है कि किसान आंदोलन का किसी दल सं संबंध नहीं है।

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिखा है। समिति ने पत्र में कहा कि सरकार की यह ग़लतफ़हमी है कि तीनों कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों के आंदोलन को विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित किया जा रहा है।

किसान संगठन की तरफ से यह पत्र ऐसी हालत में लिखा गया है कि जब एक दिन पहले प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों पर किसानों को तीन कृषि क़ानूनों को लेकर गुमराह करने का आरोप लगाया था। समिति लगभग उन 40 किसान संगठनों में से एक है, जो पिछले 23 दिन से दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

किसान संगठन के पत्र में आया है कि सच्चाई यह है कि किसानों के आंदोलन ने राजनीतिक दलों को अपने विचार बदलने पर मजबूर कर दिया है और आपके आरोप कि राजनीतिक दल इसे पोषित कर रहे हैं,पूरी तरह से ग़लत है। समिति ने पत्र में कहा कि विरोध करने वाली किसी भी किसान यूनियन और समूह की कोई भी मांग किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं है।

किसान संगठन ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखा है कि बड़े खेद के साथ आपसे कहना पड़ रहा है कि किसानों की मांगों को हल करने का दावा करते-करते, जो हमला दो दिनों से आपने किसानों की मांगों व आंदोलन पर करना शुरू किया है, वह दिखाता है कि आपको किसानों से कोई सहानुभूति नहीं है और आप उनकी समस्याओं को हल करने का इरादा शायद बदल चुके हैं, निःसंदेह, आपके द्वारा कही गई सभी बातें तथ्यहीन हैं।


अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने कहा कि आपका दावा है कि इन क़ानूनों के बनने से पहले विभिन्न स्तरों पर विस्तार से चर्चा हुई है और सभी राजनीतिक दलों ने इन परिवर्तनों के पक्ष में मत अपनाया है, इस बात पर आपको स्पष्ट होना चाहिए कि खेती राज्यों का विषय रहा है और मंडियों में परिवर्तनों के विभिन्न पहलू राज्यों में चर्चा का विषय रहे, कुछ राज्यों में कुछ परिवर्तन भी हुए, केंद्रीय स्तर पर आप ऐसे क़ानून बनाकर पूरे देश पर थोप देंगे, यह झटका एकाएक आप ही ने पांच जून को देश को दिया, आपने कभी भी इन बिंदुओं पर किसान संगठनों से कोई चर्चा नहीं की और संसद में भी विरोध की आवाजों को सुने बिना इन्हें पारित घोषित कर दिया, आपके ही झटके की देन है कि किसान आंदोलन इतने बड़े रूप में खड़ा होता जा रहा है, तथ्यों को गड्डमड्ड करने से इसका कोई समाधान नहीं निकलेगा।

किसान संगठन ने नरेंद्र मोदी के भाषण का जवाब देते हुए लिखा कि आपने यह भी दावा किया है कि विपक्षी दलों के घोषणा पत्रों में किसानों को विकल्प के रूप में बाज़ार से जोड़ने की सिफारिशें मौजूद हैं. हम नहीं जानते कि इसका क्या अर्थ है पर अगर इसका अर्थ है कि खेती के अंदर बड़े कॉरपोरेट और विदेशी कंपनियों को प्रवेश कराया जाए, मंडी व्यवस्था पर पूरा वर्चस्व जमाने और किसानों को ठेकों में बांधकर और अधिक क़र्ज़दार बनाने का है तो किसानों का इससे कोई सरोकार नहीं है, अच्छा होगा कि आप यह चर्चा विपक्षी दलों से करें और अपने इस तर्क को लेकर किसानों के आंदोलन को गुमराह करने का प्रयास न करें।

इसके साथ ही किसान संगठन ने अपने इस पत्र द्वारा कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के भी उस पत्र का जवाब दिया है, जिसे उन्होंने किसानों के नाम लिखकर आंदोलन को गुमराह करना बताया था।

संगठन ने कहा कि पत्र के अंत में किसानों की आड़ में कुछ ‘राजनीतिक दलों व संगठनों द्वारा रचे गये कुचक्र’ का हवाला देते हुए आपने ‘कांग्रेस पार्टी’, ‘आम आदमी पार्टी’, ‘हुड्डा कमेटी’, ‘अकाली दल’, ‘वोट बटोरने की राजनीति’, ‘पूज्य बापू का अपमान’, ‘दंगे के आरोपियों की रिहाई’, ‘62 की लड़ाई’, ‘भारत के उत्पादों का बहिष्कार’, आदि का लंबा चौड़ा उल्लेख किया है, जिसका किसान आंदोलन से कोई सरोकर नहीं है, न ही किसी किसान संगठन ने इस संबंध में या उससे जुड़े किसी बिंदु पर सरकार से कोई मांग उठाई है, इसलिए हम विनम्रता के साथ आपसे यह कहना चाहते हैं कि इस तरह के असंबंधित मसलों पर आपके पत्र में उल्लेख न होता तो अच्छा था, स्पष्ट है कि आप संघर्ष के असली मुद्दे पर चर्चा से ध्यान हटाने के लिए इन सारी बातों का उल्लेख कर रहे हैं.‘

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने कहा कि लगातार सभी किसान संगठनों ने आपसे आग्रह किया है कि इन तीनों कृषि क़ानूनों और बिजली बिल, 2020 को वापस लिया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ये कृषि मंडियों, खेती करने की प्रक्रिया, लागत के सामान की आपूर्ति, फसलों का भंडारण, शीतगृह, परिवहन, प्रसंस्करण, खाने की बिक्री में बड़े कारपोरेट व विदेशी कंपनियों को कानूनी अधिकार के तौर पर स्थापित कर देंगी।

किसान संगठन ने आगे कहा कि आवश्यक वस्तु क़ानून के संशोधन खुले आम जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी को बढ़ावा देंगे, खाने की कीमतें कम से कम हर साल डेढ़ गुना बढ़ाने की अनुमति देंगे और राशन व्यवस्था को चैपट कर देंगे, आपके कानून में यह भी लिखा है कि सरकार इन कंपनियों को प्रमोट करेगी क्योंकि इस सबसे चल रही खेती बरबाद हो जाएगी और किसान खेतों से बेदखल हो जाएंगे, उनकी व जुड़े हुए सभी लोगों की जीविका छिन जाएगी, इसलिए आपसे आग्रह किया कि आप इन क़ानूनों को वापस ले लें।

दूसरी ओर एनडीए के सहयोगी दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक व राजस्थान के नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने किसान आंदोलन के समर्थन में और लोकहित के मुद्दों को लेकर संसद की तीन समितियों के सदस्य पद से त्याग-पत्र देने की घोषणा कर दी। सांसद ने अपना त्याग-पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को भेजा है।

बेनीवाल ने जयपुर में संवाददाताओं से कहा कि 26 दिसम्बर को वह दो लाख किसानों के साथ दिल्ली की ओर कूच करेंगे तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बने रहने के बारे में भी फ़ैसला उसी दिन होगा।

लोकसभा अध्यक्ष को भेजे पत्र में बेनीवाल ने संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति, याचिका समिति, पेट्रोलियम व गैस मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति से इस्तीफा देने बात की है।

उनका कहना था कि उन्होंने सदस्य के रूप में जनहित से जुड़े अनेक मामलों को उठाया, लेकिन उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई, इसलिए वह किसान आंदोलन के समर्थन में और लोकहित के मुद्दों को लेकर संसद की तीन समितियों के सदस्य पद से त्याग-पत्र दे रहे हैं।