इस संगठन की अध्यक्षता सऊदी अरब को मिलने का मतलब यह है कि राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से उसकी स्थिति मज़बूत होने जा रही है लेकिन बदक़िस्मती यह है कि कई कारणों से सऊदी सरकार इस अवसर का लाभ उठाने में अक्षम नज़र आ रही है। सबसे बड़ा कारण यह है कि सऊदी अरब के बहुत महत्वपूर्ण घटक डोनल्ड ट्रम्प अमरीका का राष्ट्रपति चुनाव हार गए हैं। दूसरा कारण यमन युद्ध में आने वाली नई तेज़ी है, तीसरा कारण यह है कि सऊदी अरब में मानवाधिकार की ख़राब स्थिति के कारण कई देशों ने शिखर सम्मेलन में अपने प्रतिनिधित्व का स्तर कम करने का संकेत दिया है।
इस बीच यमन की सेना और अंसारुल्लाह आंदोलन की ओर से सऊदी अरब के शहरों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों में तेज़ी आने की पूरी संभावना है। हालिया दिनों सऊदी अरब के हमलो के जवाब में अंसारुल्लाह आंदोलन ने सऊदी अरब पर कोई ड्रोन और मिसाइल हमले किए जबकि युद्धक नौकाओं से भी सऊदी इलाक़ों पर राकेट फ़ायर किए।
इन दिनों सऊदी प्रशासन को तेल की आमदनी में भारी कमी से ज़्यादा चिंता यमन के युद्ध को लेकर है जिसमें सऊदी अरब की स्थिति लगातार कमज़ोर होती जा रही है जबकि यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन की ताक़त में तेज़ी से विस्तार हो रहा है। जो बाइडन चुनावी कैंपेन में कह चुके हैं कि यमन युद्ध के चलते वह सऊदी अरब से अमरीका के हथियारों के सारे सौदे स्थगित कर देंगे।
अमरीका की लगभग सारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से सऊदी अरब के संबंध बहुत ख़राब थे और जो बाइडन के शासन काल में यह तनाव और भी बढ़ने की संभावना है। अब अगर जो बाइडन ने ईरान के साथ परमाणु समझौते में अमरीका के वापस आने और ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने का एलान कर दिया तब तो तनाव चरम पर पहुंच जाना तय है।
इस बीच रोयटर्ज़ की यह रिपोर्ट बड़ी महत्वपूर्ण नज़र आती है जिसके अनुसार सऊदी अरब ने यमन के साथ मिलने वाली अपनी सीमा पर बफ़र ज़ोन बनाने का प्रस्ताव दिया है। इसी तरह यमन में अंतरिम सरकार के गठन और संघर्ष विराम की बात की है।
सऊदी पक्ष का कहना है कि यमन के मारिब प्रांत पर अंसारुल्लाह आंदोलन के हमले और वहां से सऊदी समर्थक संगठनों को बाहर निकाल दिए जाने के बाद अब यह प्रस्ताव समाप्त हो गया है मगर लीक होने वाली जानकारियों से पता चलता है कि यमनी पक्ष ने सऊदी अरब के सामने शर्त रखी है कि बफ़र ज़ोन सऊदी अरब की सीमा के भीतर बनेगा और इसकी कितनी चौड़ाई होगी यह अंसारुल्लाह आंदोलन तय करेगा और इसके अलावा सऊदी अरब के लिए यह भी ज़रूरी होगा कि इस युद्ध में अंसारुल्लाह की विजय को स्वीकार करे।
यमन के एक बहुत बड़े सूत्र ने हमें यह बताया कि लड़ाई जिस मोड़ पर पहुंच चुकी है वहां कोई भी संघर्ष विराम अंसारुल्लाह आंदोलन की शर्तों पर ही होगा क्योंकि इस समय अंसारुल्लाह आंदोलन ने अपनी पोज़ीशन काफ़ी मज़बूत कर ली है और सऊदी अरब की कमज़ोरी सारी दुनिया के सामने आ चुकी है।
एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि यमन का अंसारुल्लाह आंदोलन उस व्यापक और शक्तिशाली मोर्चे की मज़बूत कड़ी बन चुका है जिसका नेतृत्व ईरान के हाथ में है और इस समय जब जो बाइडन को अमरीका की सत्ता मिलने वाली है तो ईरान हरगिज़ अपने घटक अंसारुल्लाह आंदोलन को सऊदी अरब से वार्ता और संघर्ष विराम का सुझाव नहीं देगा। ईरानियों की यह ख़ासियत है कि वह बहुत संयम से अपनी लड़ाई लड़ते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार नतीजा हासिल करते हैं।
इसलिए लगता है कि ख़ुद सऊदी प्रशासन ने बफ़र ज़ोन और संघर्ष विराम से संबंधित जानकारियां रोयटर्ज़ को लीक की हैं और वह इस तरह संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया देखना चाहता है। सऊदी अरब अब वह सारी मांगें भूल गया है जो युद्ध शुरू करते समय उसने पेश की थीं अब सऊदी अरब किसी तरह इस जंग में अपनी इज़्ज़त बचाने की फ़िक्र में है।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार