23 सितंबर 2020 - 18:26
फ़ेसबुक अब यूरोप में भी सवालों के घेरे में, डाटा चुराने का संदेह, बंद हो सकती है सेवा!

फ़ेसबुक का रोल धीरे धीरे विवाद में पड़ता जा रहा है। जहां भारत में वित्तीय हितों के कारण सत्ताधारी भाजपा के कट्टरपंथी नेताओं को नफ़रत फैलाने की छूट देने के मामले पर हंगामा मचा वहीं यूरोपीय देशों ने भी फ़ेसबुक के चरित्र पर सवाल उठा दिया है।

यूरोप की एक अदालत ने फ़ेसबुक के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाते हुए कहा है कि इस कंपनी को यूरोपीय यूज़र्स के डाटा अमरीका स्थानान्तरित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती जिसके बाद फ़ेसबुक ने यूरोप में काम बंद कर देने की बातें शुरू कर दी हैं।

फ़ेसबुक ने कहा कि अगर आयरलैंड के डाटा संरक्षण अधिकारियों ने यूज़र्स का डाटा अमरीका के साथ शेयर करने पर रोक लगाई तो कंपनी यूरोप से बाहर निकल जाएगी।

जुलाई में यूरोपीय अदालत ने अपने एतिहासिक फ़ैसले में कहा था कि इस बात की पर्याप्त गैरेंटी नहीं है कि अमरीकी इंटैलीजेन्स की ओर से यूज़र्स के डाटा के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाएगा।

फ़ेसबुक की वकील इवोन कोनन ने लिखा कि अगर अदालत के फ़ैसले के अनुसार डाटा शेयरिंग पर रोक लगा दी गई तो कंपनी के लिए यूरोप में काम कर पाना संभव नहीं रहेगा।

आयरलैंड की अदालत में मुक़द्दमे के दौरान जो दस्तावेज़ पेश किए गए उनसे यह बात सामने आई कि फ़ेसबुक और दूसरी कंपनियां यूरोप से डाटा अमरीका स्थानान्तरित करती हैं और यह डाटा इस्तेमाल किया जाता है। इस डाटा के प्रयोग से यूरोपीय अर्थ व्यवस्था को नुक़सान पहुंचाने का रास्ता भी खुलता है।

दस साल तक चलने वाले मुक़द्दमे में अदालत के फ़ैसले से फ़ेसबुक को बहुत बड़ा झटका लगा है।

गार्डियन अख़बार ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के पास प्रिज़्म नाम का एक प्रोग्राम है जिसके ज़रिए वह गूगल, एप्पल और फ़ेसबुक की व्यापक और गहरी निगरानी करती है।

यह मामला सामने आने के बाद यह भी साबित हो गया कि यूरोपीय देशों ने अमरीकी कंपनियों के साथ सेफ़ हार्बर के नाम से जो समझौता किया था कंपनियां उसका पालन नहीं कर रही हैं। इसके बाद यूरोपीय संघ ने इन कंपनियों के साथ दूसरा समझौता करने की कोशिश की मगर वह भी गत जुलाई महीने में फ़ेल हो गया। सितम्बर महीने से आयरलैंड के डाटा संरक्षण विभाग ने अदालत के फ़ैसले को लागू करना शुरू कर दिया और डाटा का विदेश स्थानान्तरण रोक दिया।

स्रोतः गार्डियन