13 सितंबर 2020 - 14:01
चिंताजनक रिपोर्ट, इस्राईल की नज़र अब इराक़ पर !  यह है योजना ...

इस्राईल की राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था, आईएनएसएस में किये गये एक अध्ययन में दावा किया गया है कि इराक़ी प्रधानमंत्री, मुस्तफा अलकाज़ेमी अमरीका और ईरान दोनों के साथ संबंध रखने की खतरनाक कोशिश कर रहे हैं जिसकी वजह से इराक़ अमरीका और इस्लामी गणतंत्र ईरान का अखाड़ा बन गया है जबकि अलकाज़ेमी का मुख्य उद्देश्य, अपने देश को आतंरिक और आर्थिक समस्याओं के दलदल में फंसने के बचाना है।

तेलअबीव विश्वविद्यालय के संबंधित इस संस्था ने अपने अध्ययन में कहा है कि अलकाज़ेमी ने तेहरान और वाशिंग्टन दोनों की यात्रा की और इस दौरान उनकी चर्चा का विषय, इराक़ को प्रजातांत्रिक और मज़बूत देश बनने का अवसर दिया जाना रहा है और इन दोनों यात्राओं के दौरान अलकाज़ेमी ने जिन समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं उनसे पता चलता है कि वह इराक़ में ईरानी प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इस्राईली संस्था ने इसी प्रकार यह  भी दावा किया है कि अलकाज़ेमी ने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इराक़ में इराक़ के हस्तक्षेप पर अंकुश लगाया है लेकिन इस में उनकी सफलता की संभावना काफी कम है।

इस्राईल की राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था, आईएनएसएस अपने इस अध्ययन के आधार पर इस्राईल के ज़िम्मेदार अधिकारों को सलाह दी है कि वह इराक़ के इन हालात से भरपूर फायदा उठाएं और परशियन गल्फ के देशों से अपने व्यापक संबंधों का फायदा उठाते हुए तेलअबीब को इराक़ में बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहिए ताकि इस तरह से रणनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सके  इसी तरह इस्राईल को तेलअबीब और बगदाद के बीच खुफिया चैनल बनाने की कोशिश भी करना चाहिए।

 याद रहे इस अध्ययन में शामिल कई लोग इस्राईल की खुफिया एजेन्सी मोसाद के अधिकारी भी रह चुके हैं।

आईएनएसएस के अध्ययन में बताया गया है कि फिलहाल अमरीका और ईरान के बीच खींचतान इराक़ में आर्थिक प्रभाव को लेकर है और एक प्रकार से ऊर्जा के क्षेत्र में भी यही खींचतान नज़र आती है इस लिए संवेदनशीलता को देखते हुए अमरीका ने इराक़ को उन देशों की सूचि में शामिल करना स्वीकार किया है जिन्हें ईरान के साथ आर्थिक सहयोग की अनुमति दी गयी है विशेषकर बिजली और गैस के क्षेत्र में।

इस्राईल की राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था, आईएनएसएस  के अध्ययन में बताया गया है कि इराक़ के प्रधानमंत्री अलकाज़ेमी की हालिया वाशिंग्टन यात्रा, अमरीका की ओर से पहले से इस शर्त के बाद हुई थी कि इराक़ के  बिजली नेटवर्क को अगले वर्षों में परशियन गल्फ के देशों के नेटवर्क  से जोड़ दिया जाएगा। इस्राईली अध्ययन में कहा गया है कि सन 2003 अर्थात इराक पर अमरीकी हमले के बाद से यह पहली बार है कि इराक में प्रधानमंत्री के पद एसा नेता नज़र आता है जो  हर हाल में इराक़ी हितों की रक्षा चाहता है और जो अपने घटक ईरान से संबंधित नहीं बताया जाता और न ही वह उसके सांठगांठ करता है।

इस्राईल की राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था, आईएनएसएस के अध्ययन में यह दावा किया गया है कि ईरान, इराक़ को अपना आंगन समझता है और अपनी सुरक्षा के लिए उसे ज़रूरी समझता है लेकिन इराक़ में शिया मुसलमानों की बड़ी संख्या, इराक़ी सुरक्षा बलों में ईरान के समर्थक सशस्त्र संगठनों के विलय और दोनों देशों के बीच व्यापक सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों की वजह से भी इराक़ में ईरान का प्रभाव बढ़ा है हालांकि बीच बीच में दोनों के संबंधों में संकट भी आया है लेकिन बहुत जल्दी वह अपनी पहली हालत पर पलट जाते हैं।

आईएनएसएस के इस अध्ययन में बताया गया है कि इराक़ में अमरीका व ईरान की प्रतिस्पर्धा के अलावा भी अमरीकी सरकार इराक़ को अपने लिए बेहद अहम मानती है और अमरीका और इराक के बीच हालिया रणनैतिक वार्ता का एक मुख्य उद्देश्य, इराक़ में अमरीकी प्रभाव को सुनिश्चित करना भी है उस समय भी जब अमरीकी सैनिक इराक़ से निकल जाएं लेकिन अमरीका की विदेश नीतियों को देखते हुए अगले वर्षों में उसके इस उद्देश्य की पूर्ति बेहद कठिन हो जाएगी और अमरीका के लिए इराक़ में ईरानी प्रभाव पर अंकुश लगाना अंसभव हो जाएगा।

इस्राईल की राष्ट्रीय सुरक्षा संस्था, आईएनएसएस ने अपने अध्ययन में कहा है कि इस्राईल का हित यह है कि इराक़ में अमरीकी प्रभाव बना रहे और अगर अमरीकी सैनिक इराक़ से निकले तो ईरान के लिए मैदान खाली हो जाएगा क्योंकि बगदाद भी दमिश्क और बैरुत की तरह, ईरान के लिए बेहद अहम है। इस लिए इस्राईल को बहुत सतर्कता के साथ रहना चाहिए और यह जान लेना चाहिए कि इराक़ में उसकी कोई भी सैन्य कार्यवाही, इराक़ से अमरीकियों  की वापसी की प्रक्रिया को तेज़ ही करेगी इस लिए इस्राईली नेताओं को चाहिए कि वह अमरीकी अधिकारियों से बात चीत करें और परशियन गल्फ के अन्य देशों  के साथ संबंध बढ़ाने की कोशिश करें और इन देशों  को इराक़ में  निवेश के लिए तैयार करें और उन्हें प्रोत्साहन दें दूसरी तरह इस्राईल भी इराक़ में खुफिया चैनल बनाने की कोशिश जारी रखे। Q.A.  साभार रायुल यौम। पार्स टूडे का लेख की बातों से सहमत होना आवश्यक नहीं।