सऊदी नरेश की यह शर्त केवल एक मौखिक बात है और इसमें और ज़ायोनी शासन के साथ संबंध स्थापित करने के बारे में रियाज़ की व्यवहारिक नीति में स्पष्ट विरोधाभास पाया जाता है। संयुक्त अरब इमारात ने पिछले हफ़्ते सऊदी अरब से कहा कि वह इमारात आने-जाने वाले विमानों को अपनी वायु सीमा से गुज़रने की इजाज़त दे और आले सऊद ने तुरंत यह बात मान ली जिसके बाद इमारात जाने वाला पहला इस्राईली विमान, सऊदी अरब की वायु सीमा से हो कर अबू धाबी पहुंचा।
सऊदी अरब का यह क़दम जहां ज़ायोनी शासन से संबंध स्थापित करने के इमारात के समझौते का समर्थन था, वहीं रियाज़ व तेल अवीव के बीच संबंधों की स्थापना की ओर भी संकेत था।इसी के साथ इस्राईली विमान को सऊदी अरब की वायु सीमा इस्तेमाल करने की इजाज़त देकर रियाज़ ने फ़िलिस्तीनियों के साथ भी ग़द्दारी की है। इस लिए ज़ायोनी शासन के साथ संबंध सामान्य बनाने के लिए स्वाधीन फ़िलिस्तीनी देश के गठन की शर्त, सऊदी नरेश की ओर से सिर्फ़ एक दिखावा और ढोंग है।
एक और अहम बात यह है कि आले सऊद विशेष रूप से सऊदी युवराज मुहम्मद बिन सलमान, ज़ायोनी शासन के साथ संबंध सामान्य बनाने पर विश्वास रखते हैं। उन्होंने मार्च 2018 में अमरीका की यात्रा के दौरान स्पष्ट रूप से फ़िलिस्तीनियों को ज़ायोनी शासन के साथ तनाव जारी रहने के लिए दोषी ठहराया था। मतलब यह है कि वास्तव में बिन सलमान ने मार्च 2018 में ही इस्राईल के शासन को औपचारिक रूप से मान लिया था और फ़िलिस्तीनियों को हंगामे की जड़ बताया था।
ज़ायोनी शासन से संबंध स्थापना के बारे में सऊदी अरब के शासक सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ की कथनी और करनी में जो स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है उसकी अस्ल वजह यह है कि वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे खुल्लम खुल्ला फ़िलिस्तीन की तरफ़ पीठ कर लेंगे तो उनकी बड़ी बदनामी होगी और सऊदी अरब, इस्लामी जगत में मुंह दिखाने के लायक़ नहीं रहेगा। एक टीकाकार का इस संबंध में कहना है कि सऊदी अरब के बूढ़े शासक शाह सलमान नहीं चाहते कि अपने शासन को किसी विवादित क़दम से समाप्त करें क्योंकि अगर वे ऐसा करते हैं तो पूरा इस्लामी जगत उन पर थू-थू करेगा। इस आधार पर ज़ायोनी शासन के साथ संबंध स्थापित करने के लिए स्वाधीन फ़िलिस्तीनी देश के गठन की रियाज़ की शर्त, का मतलब फ़िलिस्तीन का समर्थन या संयुक्त अरब इमारात के क़दम की आलोचना नहीं है बल्कि यह केवल एक प्रचारिक झूठ है ताकि जनमत को धोखा दिया जा सके और सऊदी अरब के बूढ़े बादशाह को बदनाम होने से बचाया जा सके।