दूसरी ओर लीबिया के पटल पर जहां तुर्की ने अपनी ताक़त झोंक रखी है विरोधी नेता हफ़तर की सेना आगे बढ़ रही है क्योंकि उन्हें रूस से व्यापक मदद मिल रही है। इन हालात में तुर्की के भीतर राष्ट्रपति अर्दोग़ान के क़रीबी सहयोगी रह चुके अहमद दाऊद ओग़लू ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने कहा कि तुर्की इस समय बड़े गंभीर संकटों से जूझ रहा है। इनमें एक संकट कोरोना वायरस की महामारी का है, दूसरा संकट भूमध्यसागर के इलाक़े में यूरोपीय देशों से तनाव है और तीसरा संकट अर्थ व्यवस्था को लगने वावले झटके हैं जबकि इन संकटों से निपटने की राष्ट्रपति अर्दोग़ान की शैली ख़तरनाक और घातक है।
दाऊद ओग़लू जो अब सत्ताधारी जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी से अलग हो चुके हैं ओटोमन एम्पायर की बहाली के समर्थकों में गिने जाते हैं। उन्होंने रोयटर्ज़ को इंटरव्यू दिया और उसमें राष्ट्रपति अर्दोग़ान को चेतावनी दी कि वह कूटनैतिक माध्यमों को नज़रअंदाज़ करके सैनिक रास्तों को ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि देश के भीतर भी उन्होंने तानाशाही शुरू कर दी है।
दाऊद ओग़लू वर्ष 2009 से 2014 तक तुर्की के कूटनैतिक विभाग को संभालते रहे और दो साल उन्होंने प्रधानमंत्री का पद संभाला। उनका कहना है कि यूनान के साथ जारी वर्तमान तनाव सैनिक टकराव में बदल सकता है।
एक बड़े तुर्क डिपलोमैट ने मीडिया को बताया कि देश के भीतर राजनैतिक स्तर पर मज़बूत एकता की कमी है और इन हालात में कई मोर्चों पर तुर्की का भिड़ जाना ख़तरनाक है। शायद यही वजह है कि दाऊद ओग़लू ने अपनी चुप्पी तोड़ी है और अपनी बात रखने के लिए रोयटर्ज़ जैसा अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफ़ार्म चुना है।
तुर्की के पूर्व उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अली बाबाजान जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तुर्की को मज़बूत अर्थ व्यवस्था देने में बुनियादी भूमिका निभाई, अब सत्ताधारी पार्टी से अलग हो चुके हैं और वह भी किसी समय भी अपनी चुप्पी तोड़ सकते हैं।
पश्चिमी देशों से तुर्की का टकराव गंभीर रूप ले चुका है जो कभी भी कड़े आर्थिक प्रतिबंधों में बदल सकता है। इस समय तुर्की को मज़बूत डिपलोमैसी की ज़रूरत है जो इस समय उसके पास नहीं है और यह सोचने का विषय है।
स्रोतः रायुल यौम