लेकिन चार साल बाद ही, दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट के कारण, अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इसी के साथ यह भी सवाल उठ रहा है कि फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों का आगे काम कैसे चलेगा, जो पूरी तरह से तेल से होने वाली आय पर निर्भर हैं।
उसके बाद अल-सालेह का मंत्रालय बदल दिया गया और उनकी जगह मरयम अल-अक़ील को यह क़लमदान सौंप दिया गया। दो हफ़्ते बाद ही सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन बिल पर कुवैत में काफ़ी घमासान हुआ, जिसके कारण उनकी जगह बाराक अल-शीतन ने यह पद संभाला, जिन्होंने पिछले महीने ही चेतावनी दी थी कि अक्तूबर के बाद, सरकार के पास वेतनों का भुगतान करने के लिए पर्याप्त नक़दी नहीं है।
तेल की आय में कमी के बावजूद, भारी ख़र्चों में कटौती की रफ़्तार बहुत धीमी होने के कारण, फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों को विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। अभी तक इन देशों के शासक पैट्रो डॉलर पानी की तरह बहाकर लोगों की वफ़ादारी ख़रीदते रहे हैं, लेकिन आने वाले दिनों में उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं होगा।
वाल स्ट्रीट जरनल के साथ बातचीत में कुवैत की राजनीतिक और आर्थिक मामलों की कंपनी बेनसिर्री के प्रमुख फ़वाज़ अल-सिर्री का कहना था कि एक दिन जब हम सो कर उठेंगे तो हमें पता चलेगा कि हम अपनी सारी जमा पूंजी ख़र्च कर चुके हैं। इसलिए नहीं कि हम अपने बैंक खातों को चैक नहीं करते हैं, बल्कि इसलिए कि हम जब इसे देखते हैं तो सोचते हैं कि शायद यह बैंक की कुछ गड़बड़ी से ऐसा हुआ है, उसके बाद भी हम नई रोलैक्स ख़रीद लेते हैं।
तेल-निर्यातक देशों के क्लब ओपेक ने इस साल कच्चे तेल की क़ीमतों में ऐतिहासिक गिरावट के बाद, उसे पुनर्जीवित किया है, लेकिन यह अभी भी 40 डॉलर प्रति बैरल है, जो काफ़ी कम है। कोरोना वायरस महामारी और अक्षय ऊर्जा (renewable energy) का चलन बढ़ने से क़ीमतों में गिरावट बनी रहने की संभावना है।