22 अगस्त 2020 - 15:31
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान के ख़िलाफ़ अब अमरीका के तरकश में कितने तीर बचे हैं?

शुक्रवार को ईरान के ख़िलाफ़, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को फिर से बहाल करने को लेकर अमरीका उस वक़्त और भी अलग-थलग पड़ गया, जब सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 13 ने पत्र लिखकर वाशिंगटन का विरोध किया।

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के इस एलान के सिर्फ़ 24 घंटों के बाद कि उन्होंने परमाणु समझौते के तहत 30 दिनों में ईरान पर यूएन के प्रतिबंधों की बहाली के लिए स्नैपबैक प्रावधान को ट्रिगर कर दिया है, वाशिंगटन के सबसे बड़े सहयोगियों ब्रिटने, फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम समेत चीन, रूस, वियतनाम, नाइजर, सेंट विंसेंट, ग्रेनेडाइंस, दक्षिण अफ़्रीक़ा, इंडोनेशिया, एस्टोनिया और ट्यूनीशिया ने अमरीका के इस क़दम के ख़िलाफ़ पत्र लिखकर अपने विरोध की घोषणा कर दी।

हालांकि ईरान के मामलों में अमरीका के विशेष प्रतिनिधि ब्रायन हुक का कहना था कि हमें किसी की अनुमति की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि ईरान, परमाणु समझौते का उल्लंघन कर रहा है। स्नैपबैक की शुरूआत का समय आ गया है, आज 30 दिन की प्रक्रिया का पहला दिन है।

यहां यह सवाल है कि पहली बार विश्व भर के देश अमरीका के साथ खड़े होने के बजाए उसके ख़िलफ़ क्यों हो गए हैं?

वास्तव में 2018 में जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने परमाणु समझौते से निकलने का एलान किया तो उस समय भी समझौते में शामिल बाक़ी देशों, ब्रिटने, फ़्रांस, जर्मनी, चीन, रूस और ईरान ने अमरीका के बिना ही इस समझौते को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया था।

ट्रम्प प्रशासन ने इस समझौते को सबसे बुरा समझौता क़रार देते हुए ईरान के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा कड़े प्रतिबंध लागू कर दिए थे और यह दावा किया था कि बहुत जल्द तेहरान, वाशिंगटन की अधिकतम दबाव की नीति के सामने घुटने टेक देगा और एक अच्छे समझौते के लिए तैयार हो जाएगा।

लेकिन उसके बाद से हर क़दम पर यह साबित होता गया कि ट्रम्प प्रशासन से एक बड़ी चूक हो गई है, जिसे रणनीतिक मूर्खता का भी नाम दिया जा रहा है। समय गुज़रने के साथ ट्रम्प ने अपनी इस ग़लती को स्वीकार करने और परमाणु समझौते में वापस लौटने के बजाए, स्नैपबैक प्रावधान का इस्तेमाल करके ईरान पर दोहरा दबाव बनाने का फ़ैसला लिया है।

अब आगे क्या होगा और ईरान के ख़िलाफ़, अमरीका के पास कौन से विकल्प हैं?

2015 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित करके यह सुनिश्चित किया था कि अगर समझौते के उल्लंघन की शिकायत के 10 दिन के अंदर परिषद के किसी सदस्य ने प्रतिबंधों की छूट को आगे बढ़ाने के लिए कोई प्रस्ताव पेश नहीं किया तो अगले 20 दिनों में परिषद का अध्यक्ष ऐसा कर सकता है।

ऐसी स्थिति में अमरीका, उसे वीटो कर सकता है, जिसके बाद ईरान के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की बहाली के लिए रास्ता साफ़ हो जाएगा।

हालांकि, 2015 के प्रस्ताव में यह भी उल्लेख किया गया है कि परिषद को समझौते में शामिल देशों के दृष्टिकोण पर ध्यान देना होगा। परिषद में अमरीका के कड़े विरोध को देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि अगस्त में इंडोनेशिया परिषद का अध्यक्ष है और सितम्बर में नाइजर परिषद का अध्यक्ष होगा, दोनों ही देश ऐसा कोई मसौदा पेश करने नहीं जा रहे हैं।

पोम्पियो और हुक को उम्मीद है कि इंडोनेशिया या नाइजर मतदान के लिए परिषद में प्रस्ताव का मसौदा पेश कर सकते हैं। अमरीका के पास दूसरा विकल्प यह है कि वह ख़ुद ही प्रस्ताव पेश करे और फिर ख़ुद ही उसे वीटे भी कर दे।

हालांकि अमरीका की शिकायत के कुछ ही घंटों के बाद ब्रिटेन, जर्मनी और फ़्रांस ने एक संयुक्त पत्र लिखकर कहा है कि इस प्रक्रिया के तहत जो फ़ैसला किया जाए या क़दम उठाया जाए, वह क़ानून के दायरे में होना चाहिए।  

अगर अमरीका ख़ुद ही प्रस्ताव पेश करता है और उसे ख़ुद ही वीटो करके प्रतिबंधों के स्नैपबैक का दावा करता है, तो सुरक्षा परिषद के बाक़ी सदस्य उसे रद्द कर देंगे और परमाणु समझौते को सक्रिय मानते हुए प्रतिबंधों को ख़त्म समझेंगे। ऐसी स्थिति में अमरीका, सुरक्षा परिषद के सदस्यों पर भी प्रतिबंध लगाने की कोशिश करेगा।

वास्तव में अगर ऐसा होता है तो इसक मतलब होगा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौत। इससे पहले भी ट्रम्प प्रशासन ने कई बार इससे निकलने की इच्छा जताई थी।