ट्रम्प ने इस समझौते को अच्छा बताते हुए पत्रकारों से कहा कि आप सोच भी नहीं सकते कि कौन कौन से देश इस समझौते से जुड़ना चाहते हैं। अलबत्ता उन्होंने इस संबंध में सऊदी अरब के अलावा किसी भी देश का नाम नहीं लिया। ट्रम्प ने वाइट हाउस में आयोजित हुए पत्रकार सम्मेलन में इस्राईल व इमारात के बीच हुए समझौते से सऊदी अरब के जुड़ने की संभावना के बारे में कहा कि हां, इसकी संभावना है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब सऊदी अरब ने इस समझौते पर अपनी पहली औपचारिक प्रतिक्रिया में बुधवार को कहा कि वह अरब शांति योजना के परिप्रेक्ष्य में ज़ायोनी शासन के साथ शांति पर कटिबद्ध है।
सऊदी अरब ने सन 2002 में अरब शांति योजना पेश की थी। इस योजना के आधार पर अगर इस्राईल इस बात को मान लेता है कि वह फ़िलिस्तीनियों को उनका एक स्वाधीन देश बनाने देगा और सन 1967 के अवैध अधिकृत क्षेत्रों से पूरी तरह बाहर निकल जाएगा तो इसके बदले में अरब देश उसके साथ कूटनैतिक संबंध स्थापित करेंगे। ट्रम्प ने कभी भी यह बात नहीं छिपाई है कि वे सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात को अमरीका के गले-सड़े हथियारों की बिक्री की मंडी बनाना चाहते हैं लेकिन इस शर्त के साथ कि ये हथियार, शक्ति के उस संतुलन को न बिगाड़ें जो इस वक़्त ज़ायोनी शासन के पक्ष में है। ट्रम्प ने कहा है कि इमारात, अमरीका से एफ़-23 युद्धक विमान ख़रीदना चाहता है जो इस्राईल के पास भी हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने कहा कि उनके पास बहुत पैसे हैं और वे कुछ एफ़-35 विमान ख़रीदना चाहते हैं।
इस बीच ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू की ज़बान अपने बड़े भाई ट्रम्प से भी ज़्यादा तेज़ है। उन्होंने कहा है कि इस्राईल, इमारात को इस स्तर का कोई भी हथियार बेचे जाने का विरोधी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि क्षेत्र में शक्ति का संतुलन इस्राईल के ही पक्ष में होना चाहिए। अलबत्ता इमारात ने भी कहा है कि वह एफ़-35 ख़रीदने का पक्का इरादा रखता है और इसके लिए कई गुना अधिक दाम देने को भी तैयार है।
अमरीका और इस्राईल के प्रतिनिधित्व में अरब देशों के लिए जो नया मिशन तैयार किया गया है वह चार बिंदुओं पर आधारित हैः
- सऊदी अरब व अन्य अरब देश, इस्राईल व इमारात के समझौते से जुड़ें। यह बात ट्रम्प ने खुल कर कही है। अभी उन्होंने सिर्फ़ सऊदी अरब का नाम लिया है लेकिन संभावित रूप से उनका इशारा बहरैन और फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती अन्य अरब देश हैं। काफ़ी समय से इस्राईल से गोपनीय संबंध रखने के बाद अब उन्हें इस संबंधों की खुल कर घोषणा करनी होगी।
- इन छोटे अरब रजवाड़ों को हथियारों की बिक्री, इस्राईल से उनकी रक्षा के लिए नहीं होगी बल्कि उसे देश से युद्ध के लिए होगी जिसने इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद से अब तक क्षेत्र की रक्षा की है और अमरीका के मुक़ाबले में डट कर खड़ा हुआ है।
- ईरान पर राजनैतिक और अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाना। ट्रम्प ने घोषणा की है कि वे संयुक्त राष्ट्र संघ को सचेत कर चुके हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ सभी प्रतिबंधों को बहाल करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने बुधवार को अपने विदेश मंत्री माइक पोम्पियो को ज़िम्मेदारी सौंपी है। यह ऐसी स्थिति में है कि जब उन्होंने कहा है कि राष्ट्रपति चुनाव दोबारा जीतने पर वे तेहरान के साथ एक नए समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। अलबत्ता अधिकतर टीकाकारों को इस बात में संदेह है कि वे ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों को बहाल कर सकते हैं।
- क्षेत्र से अमरीका का धीरे धीरे बाहर निकलना और परिस्थितियों का नियंत्रण अपने कुछ क्षेत्रीय पिट्ठू अरब देशों के हाथ में देना। इस तरह अमरीका इस क्षेत्र में दो दशक से जारी अपनी सैन्य उपस्थिति को ख़त्म कर देगा ताकि चीन, रूस व उत्तरी कोरिया से संभावित टकराव के लिए अपने आपको तैयार कर सके।
टीकाकारों का कहना है कि अमरीका के राष्ट्रपति, जिन्होंने काफ़ी आगे तक की योजनाएं बना ली हैं, अभी इस बात से ही आश्वस्त नहीं हैं कि वे दूसरी बार भी राष्ट्रपति बन जाएंगे। अगर वे अगली बार राष्ट्रपति नहीं बने, जिसकी संभावना बहुत अधिक है तो उनकी सारी योजनाएं धरी की धरी रह जाएंगी।