संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने कुछ दिन पहले अमरीका के उस प्रस्ताव को निरस्त कर दिया था जिसमें ईरान के ख़िलाफ़ हथियार संबंधी प्रतिबंध की समय सीमा बढ़ाने की बात की गई थी। इस शर्मनाक हार के बाद अमरीका की सरकार ने कहा कि वह ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के प्रतिबंधों को लौटाने के लिए परमाणु समझौते और सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव नंबर 2231 के स्नेप बैक या ट्रिगर मेकेनिज़म को इस्तेमाल करना चाहती है। अमरीका लगभग दो साल पहले ही परमाणु समझौते से निकल चुका है और अब वह परमाणु समझौते का सदस्य नहीं रह गया है। इसके बावजूद वह इस बात का दावा करता है कि प्रस्ताव नंबर 2231 के दसवें पेराग्राफ़ के अंतर्गत परमाणु समझौते में शामिल देश के रूप में स्नेप बैक के विकल्प को इस्तेमाल कर सकता है और परमाणु समझौते से पहले ईरान पर जितने भी प्रतिबंध लगे हुए थे, उन्हें लौटा सकता है।
बड़ी स्पष्ट सी बात है कि अमरीका प्रचलित क़ानूनी रास्तों से ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध बहाल नहीं कर सकता क्योंकि वह पहले ही परमाणु समझौते से एकतरफ़ा तौर पर निकल चुका है और ईरान के ख़िलाफ़ वह जितने भी आरोप लगा रहा है उनकी कोई क़ानूनी हैसियत नहीं है। यहां पर एक तकनीकी पहलू यह है कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव नंबर 2231 में एक ग़लत परंपरा की नीव डाली गई है और वह यह है कि ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों की बहाली के लिए सुरक्षा परिषद में मतदान के बजाए प्रतिबंध समाप्ति के लिए मतदान किया जाएगा। इस स्थिति में सुरक्षा परिषद का कोई भी स्थायी सदस्य अपने वीटो के अधिकार को इस्तेमाल करके प्रतिबंधों की समाप्ति की मंज़ूरी को रोक दे और प्रतिबंधों को लौटा दे।
क्या रूस, चीन व परमाणु समझौते के सदस्य यूरोपीय देश अमरीका की इस बदमाशी को रोक सकते हैं? अनेक विशेषज्ञों का कहना है कि यह देश ऐसा कर सकते हैं जबकि कुछ अन्य का कहना है कि वे ऐसा नहीं कर सकते। इस बात को समझने के लिए सुरक्षा परिषद में होने वाले मतदान के बारे में कुछ बातें समझना ज़रूरी हैं। सुरक्षा परिषद में दो तरह के मतदान होते हैं, एक में किसी प्रस्ताव को पारित करने के लिए परिषद के 9 सदस्यों के वोटों की ज़रूरत होती है और किसी भी सदस्य को वीटो का अधिकार नहीं होता जबकि दूसरी तरह के मतदान में किसी प्रस्ताव को पारित होने के लिए 9 सदस्यों के वोटों की ज़रूरत होती है लेकिन शर्त यह है कि कोई भी स्थायी सदस्य उसे वीटो न करे। सुरक्षा परिषद में हमेशा इन दोनों मतदानों के विषय के बारे में मतभेद रहा है।
टीकाकारों का कहना है कि रूस व चीन एक प्रस्ताव पेश करके कह सकते हैं कि अमरीका अब परमाणु समझौते का सदस्य नहीं है और उसे इस समझौते के उल्लंघन के बारे में ईरान पर आरोप लगाने का अधिकार नहीं है और चूंकि यह पहले प्रकार का मतदान है इस लिए अमरीका इसे वीटो भी नहीं कर सकता। अलबत्ता इस प्रस्ताव को पारित होने के लिए 9 वोटों की ज़रूरत होगी। दूसरी तरफ़ अमरीका कह सकता है कि यह सुरक्षा परिषद के एक बाध्यकारी प्रस्ताव की व्याख्या से संबंधित है इस लिए इस पर दूसरे प्रकार का मतदान होगा और वह इसे वीटो कर सकता है।
बहरहाल इससे अमरीका व संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की स्थिति ख़तरे में पड़ जाएगी। फ़ाॅरेन पाॅलिसी पत्रिका में छपे एक लेख में रिचर्ड गोल्डबर्ग ने, जो ट्रम्प के अनौपचारिक सलाहकार माने जाते हैं, इस ख़तरे को भांप लिया है और "ईरान को, सुरक्षा परिषद में परिवर्तन लाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए" शीर्षक के अंतर्गत लिखा है कि अगर ऐसा हो गया तो सुरक्षा परिषद में मतदान का ढांचा हमेशा के लिए बदल जाएगा। उन्होंने लिखा है कि अगर सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने पहले प्रकार के मतदान को स्वीकार नहीं किया और अमरीका को इस संबंध में वीटो से वंचित नहीं किया तो न सिर्फ़ यह कि सुरक्षा परिषद का 75 साल का अतीत बदल जाएगा बल्कि यह परिषद भी हमेशा के लिए बदल जाएगी और फिर किसी भी सदस्य के पास वीटो का एकछत्र अधिकार नहीं रह जाएगा बल्कि इसके लिए सर्वसम्मति की ज़रूरत पड़ेगी।
अमरीका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जाॅन बोलटन भी, जो ईरान के ख़िलाफ़ सबसे अतिवादी अमरीकी अधिकारियों में से एक हैं, इस ख़तरे को भांप गए हैं और उन्होंने दो दिन पहले एक लेख में चेतावनी दी थी कि ईरान के ख़िलाफ़ ट्रिगर मेकेनिज़म को सक्रिय करना, इसके ख़तरे के मुक़ाबले में मूल्यहीन है क्योंकि यह सुरक्षा परिषद में वीटो के अधिकार को, जो अमरीका के हित में है, कमज़ोर कर देगा। इस आधार पर ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका का यह क़दम यद्यपि ईरान के विरुद्ध पिछले प्रतिबंधों को लौटा सकता है लेकिन दूसरी तरफ़ यह ईरान की एक बड़ी सफलता होगी और वह दूसरे विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ पर कुछ देशों के वर्चस्व को क़ानूनी बनाने के लिए संसार पर थोपी गई ज़ोर-ज़बरदस्ती की व्यवस्था को कमज़ोर बना देगा।