16 अगस्त 2020 - 13:40
इस्राईल के साथ डील करके यूएई को क्या मिला? यूएई से पहले इस तरह की डील करने वालों कों क्या दिया इस्राईल ने? फिलिस्तीन मूल के प्रसिद्ध पत्रकार का विचारयोग्य लेख

इस्राईल और यूएई की बीच अमरीका की निगरानी में संबंधों को सामान्य बनाने की जो डील हुई है वह अतीत के सभी इस प्रकार के समझौतों की तरह एक गद्दारी है जो पहले मिस्र और जार्डन ने की थी।

यह बड़े अफसोस की बात है कि कुछ लोग इस डील का स्वागत कर रहे हैं और इसे " एतिहासिक" और अरब जगत के लिए नये चरण का आरंभ भी बता रहे हैं। क्या सेंचुरी डील के लिए फिलिस्तीन को बेचना, बैतुलमुक़द्दस, वहां की मस्जिदुलअक़्सा को छोड़ देना और सभी इस्लामी व अरब सिद्धान्तों से मुंह मोड़ना, एतिहासिक दिन है? ईरान से मुक़ाबले के बहाने अरब साम्राज्य का ताज इस्राईल के सिर रखना एतिहासिक दिन है? यह कैसी न्यायपूर्ण डील है जिसमें न तो बैतुलमुक़द्दस का नाम है न फिलिस्तीनी देश का ?

     हां यह सही है कि यूएई और इस्राईल की डील, फिलिस्तीन मुद्दे को शांत कर देगी, मतलब उसे हमेशा के लिए खत्म कर देगी। शायद नेतेन्याहू की यह बात सही है कि वह हमारे साथ सबंधों को सामान्य कर रहे हैं क्योंकि हम ताकतवर हैं और वह कमज़ोर, वह उन अरबों की बात कर रहे हैं जो उनके साथ संबंधों को सामान्य बनाते हैं उन अरबों की बात नहीं जो जब गज़्ज़ा से राकेट फायर करते हैं तो नेतेन्याहू चूहों की तरह बंकर की तरफ भागते नज़र आते हैं।

     हम में से कुछ लोग जिस तरह से अमरीका और ट्रम्प को गुंडा टैक्स देने का कारण, खतरे से सुरक्षा बता रहे थे उसी तरह अब एक  काल्पनिक खतरे की बात कह कर इस्राईल के साथ संबंध सामान्य करने को सही ठहरा रहे हैं। यह तो हमें पता है कि इस डील से नेतेन्याहू और ट्रम्प को फायदा मिलेगा भले ही वह अस्थाई हो लेकिन सवाल यह है कि इस डील से यूएई की क्या मिला? यूएई तेल से समृद्ध एक मालदार देश है, उसने फ्रांस अमरीका और ब्रिटेन से रक्षा समझौते कर रखे हैं और इन सब देशों की छावनियां उसके वहां मौजूद हैं और पिछले ही हफ्ते उसके विदेशमंत्री ने ईरान के विदेश मंत्री से बेहद प्रेम भाव से भेंट की है।

 

     दुनिया में शांति समझौते पर हस्ताक्षर वही देश करते हैं जो दुश्मन रहे हों और युद्ध किया हो तो क्या यूएई की इस्राईल के साथ युद्ध की दशा में था या इस्राईल से कभी युद्ध किया ? हमें तो इस तरह की कोई जानकारी नहीं है।

     हम यूएई का तर्क समझ लेते अगर इस्राईल के साथ इस तरह की डील पर हस्ताक्षर करने वाले देश और संगठन, विकास की चोटी पर होते और आर्थिक, सैनिक और तकनीकी क्षेत्र में उनकी गिनती ही। हम यहां पर मिस्र, जार्डन और फिलिस्तीन प्रशासन की बात कर रहे हैं इन तीनों को इस्राईल के साथ इस प्रकार की डील पर हस्ताक्षर करके क्या मिला? आज इस्राईल मिस्र के लिए हानिकारक अन्नहज़ा डैम का समर्थन कर रहा है और मिस्र के विरोधी पक्ष को सैन्य मदद भी दे रहा है, जार्डन को इस तरह से बदला दे रहा है कि  जार्डन वादी का इस्राईल में विलय कर रहा है और उसकी कृषि की भूमियों पर क़ब्ज़ा जमाए है और जहां तक फिलिस्तीनी प्रशासन की बात है कि जिसने सब से पहले संबंध सामान्य बनाने का फैसला किया था तो उसका हाल तो किसी से छुपा नहीं है।

      हमें यूएई बेहद प्यारा था हमें ही नहीं सभी अरबों और मुसलमानों को लेकिन उस समय जब वह बहादुरी और साहस का नमूना था, जब उसका नेतृत्व एसे के हाथ में था जिसने सन 1973 के युद्ध में तेल के कुंओं का मुंह बंद करके एतिहासिक वाक्य कहा था कि " तेल खून से महंगा तो नहीं है "

     इस समय तो हमें बस उन साज़िशों का ही रूप नज़र आया है जिसकी वजह से इराक़, सीरिया, यमन और लीबिया को तबाह कर दिया गया, फिलिस्तीनियों को भूखा रखा गया, पीएलओ के लिए गद्दारी को सुदंर बना कर पेश किया गया और उसके उस नेता को ज़हर दे दिया गया जो ओस्लो  की अपनी गलती की प्रतिरोध द्वारा भरपाई करना चाह रहा था।

     सन 1982 की हार के गर्भ से इस देश के इस्लाती प्रतिरोध मोर्चे का जनम हुआ और सन 1976 की हार से फिलिस्तीनी प्रतिरोध ने जनम लिया, सन 2000 में   दूसरे कैम्प डेविड की साज़िश के पेट से अवैध अधिकृत फिलिस्तीन में दूसरा सशस्त्र आंदोलन आरंभ हुआ।

     इस समाज में बहुत दम है, उसका सकंल्प ठोस है, इस राष्ट्र के सपूतों में बड़ी बड़ी सफलताएं अर्जित करने का दम खम है, अभी गिरा है लेकिन बहुत जल्दी उठ खड़ा होगा तब सब देख लेंगे। Q.A. साभार रायुल यौम. लंदन