भारत के अयोध्या नगर में गिरायी गयी बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिल के शिलान्यास कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बल दिया कि नये भारत का जन्म हो चुका है और भगवान राम, सदियों बाद उस स्थान पर विराजमान हो गये जहां उनका जन्म हुआ था।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बयान में कोई नयी बात नहीं है क्योंकि मंदिर निर्माण, सत्ताधारी भाजपा के एजेन्डे में शामिल है और शिलान्यास कार्यक्रम में नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत रूप से भागीदारी इस बात का खुला संदेश है कि हिन्दुवादी भाजपा के नेतृत्व में भारत की वर्तमान सरकार, इस योजना का समर्थन करती है जो नये भारत के जन्म में महत्वपूर्ण भूमिका रखती है। मंदिर निर्माण और मस्जिद को गिराने की मांग करने वाले कट्टरपंथी हिन्दु संगठनों की कोख से जनम लेने वाली भाजपा ने हमेशा इस बात की घोषणा की है।
इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि बाबरी मस्जिद को मंदिर की जगह पर बनाया गया है लेकिन इसके बावजूद सन 1992 में कट्टरपंथी हिन्दु संगठनों की देख रेख में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया और अब उन्ही संगठनों और उनके नेताओं ने शिलान्यास में भाग लिया। यह सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के उस विवादस्पद फैसले के बाद हुआ जिसमें उसने फैसले का आधार आस्था को बनाते हुए उस जगह राम मंदिर बनाने की अनुमति दे दी थी हालांकि बाबरी मस्जिद विध्वंस को एक अपराध भी कहा।
नया भारत
भरत ने स्वाधीनता के बाद से हमेशा अपनी धर्म निरपेक्षता को सुरक्षित रखा और उसे महत्व दिया, इसी लिए भारत में संवैधानिक रूप से सभी धर्मों की शिक्षाओं का सम्मान किया गया और भारत इसी वजह से पूरी दुनिया में पहचाना जाता है लेकिन अब जिस तरह से भारत के प्रधानमंत्री ने मंदिर शिलान्यास में भाग लिया वह वास्तव में नये भारत का आरंभ है जहां राजनीतिक व धर्म को एक दूसरे से मिला दिया गया है।
अयोध्या के कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वंय संघ के प्रमुख मोहन भागवत विशेष अतिथि थे, उन्होंने कहा कि सब को राम की शिक्षाओं का पालन करना चाहिए ताकि भारत को अतीत का गौरव फिर से हासिल हो सके, उपस्थित लोगों ने उनकी इस बात का तालियों से स्वागत किया। भारत में कट्टरपंथी हिन्दुओं के समर्थन के लिए ही भाजपा सरकार ने कई बड़े बड़े फैसले किये हैं जिनमें तीन तलाक़ पर प्रतिबंध और कश्मीर की स्थिति में परिवर्तन शामिल हैं जिसके बाद कश्मीरियों के दुखों को एक साल का समय बीत चुका है क्योंकि इस क्षेत्र के अधिकांश नेता, नज़रबंद हैं और आम कश्मीरियों को विभिन्न समस्याओं का सामना है, क्योंकि बाहरी दुनिया से उनका संपर्क लगभग कटा हुआ है, सोशल मीडिया पर कड़े प्रतिबंध हैं और कर्फ्यू और लॉकडाउन से स्थानीय अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से तबाह हो चुकी है।
बहुत से विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार, अपनी जनता को धर्म के आधार पर बांटना चाहती है जिसकी झलक एनआरसी और सीएए सहित उसके बहुत से फैसलों में मिलती है, कश्मीरियों के हालात तो बेहद खराब हैं, उनके अधिकांश नेता जेलों में हैं, स्थानीय रूप से महत्वपूर्ण कार्यक्रम और त्योहारों पर प्रतिबंध हैं, बहुत से इलाक़ों के कश्मीरी नाम को बदला जा रहा है और कश्मीरी दूर दराज़ रहने वाले अपने प्यारों से संपर्क करने में कई प्रकार की समस्याओं का शिकार हैं इन सब हालात की वजह से कश्मीर में असंतोष बुरी तरह से फैल रहा है।
हमारे ख्याल में मंदिर निर्माण के लिए इतना अधिक खून खराबा करने की ज़रूरत नहीं थी यह मुद्दा हिन्दु मुस्लिम सौहार्द और बातचीत से हल किया जा सकता था लेकिन बात यह है कि मस्जिद मंदिर मुद्दा, धार्मिक होने से अधिक राजनीतिक हो गया है उसकी वजह यह है कि भारत के हिन्दुओं में राम का विशेष स्थान है इसी लिए आम जनता की आस्था से राजनीतिक पार्टियां और नेता, लाभ उठाकर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति करना चाहते हैं।
बहरहाल अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास, भारत में धार्मिक पर्यटन के बढ़ावा देने का कारण बनेगा और पूरी दुनिया में अयोध्या का विशेष स्थान हो जाएगा जिसके बाद पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी जिसका सीधा असर उत्तरप्रदेश की अर्थ व्यवस्था पर पड़ेगा क्योंकि कोरोना की वजह से भारत की भी अर्थ व्यवस्था मंदी से जूझ रही है।
इन सब के साथ यह भी एक ठोस सच्चाई है कि भारत की सारी शक्ति, उसकी गंगाजमुनी सभ्यता, धर्म निरपेक्षता और सांस्कृतिक विविधता में निहत है यही वजह है कि सदियों से इस देश में विभिन्न धर्म व जाति के लोग फले फूले और रहे हैं लेकिन अब जब कि इस देश में धर्म और राजनीतिक को एक दूसरे में इस तरह से मिलाया जा रहा है तो फिर कुछ खतरे भी सिर उभार रहे हैं क्योंकि यह काम एसे समय पर हो रहा है जब भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी शक्ति व प्रभाव का लोहा मनवाना आरंभ किया है और उसे एक शक्तिशाली व प्रभावशाली देश के रूप में देखा जाने लगा है।
भारत को इस बात का अधिकार है कि वह अपने अतीत पर गर्व करे और अपने खोये हुए गौरव को वापस लाए लेकिन यह काम अगर अपने सभी नागरिकों के सहयोग और संविधान की छाया में हो तभी यह संभव है। राम मंदिर के निर्माण को सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए न कि राजनीतिक दृष्टि से। भारत को अभी एक एसी सरकार तक पहुंचने में बहुत समय लगेगा जो अपने देश से निर्धनता, बीमारी और अशिक्षा का अंत करने की शक्ति रखती हो।
धर्म और कहानियों को राजनीति से मिलाने का लाभ देश के लोगों को नहीं मिलेगा और न ही इससे भारत की शक्ति बढ़ने वाली है। अगर धर्मांध लोगों के कांधों पर भारत के विकास का बोझ रहा तो धीरे धीरे वह भारत को उस जगह पहुंचा देंगे जहां सुरक्षा का अंत होता है और समाज टुकड़ों में बंट जाता है। भारत में 3300 एसी मस्जिदें हैं जिन्हें बाबरी मस्जिद की तरह तोड़ कर वहां मंदिर बनाया जा सकता है तो फिर इससे समाज का जो ध्रुवीकरण होगा वह भयानक तबाही की ओर ही भारत को ले जाएगा तो फिर क्या कहते हैं आप? यह आधुनिक भारत का जन्म है या फिर एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था का अंत है?