5 अगस्त 2020 - 13:37
राफाइल देने वाले देश के समाचारपत्र की भारत को खरी खरी ... कश्मीर में भारतीय प्रजातंत्र पर अपमान व कलंक की धूल

भारत को राफाइल युद्धक विमान बेचने वाले फ्रांस के समाचार पत्र लीमोन्ड ने अपने एक लेख में भारत प्रशासित कश्मीर के हालात का जायज़ा लिया है जिस पर अलजज़ीरा ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। पेश हैं उसके कुछ भाग।

लीमोंड समाचार पत्र ने लिखा है कि फ्रांस और पश्चिमी जगत, कश्मीर के लोग जिन त्रासदीपूर्ण परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं उस पर चुप नहीं रह सकता और न ही वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में नस्लवादी रूढ़िवाद पर चुप्पी साध सकते हैं।

     5 अगस्त वह दिन है जब एक साल पहले मोदी सरकार ने कश्मीर की स्वायत्ता खत्म करने का फैसला किया, मुस्लिम बहुल्य यह राज्य हिमालय के आंचल में स्थित है और सन 1949 से और भारतीय संविधान के आधार पर इस राज्य को विशेष दर्जा प्राप्त था लेकिन नरेन्द्र मोदी ने 5 अगस्त सन 2019 में बेहद बर्बर तरीक़े से इस राज्य को नयी दिल्ली के निंयत्रण में लाने का फैसला किया और उसे पूरी दुनिया से काट दिया, कश्मीर का बाहर की दुनिया से हर तरह का संपर्क काट दिया गया और कई महीनों तक इस क्षेत्र को कड़े घेरे में रखा और इस तरह से कश्मीर कोविड-19  के फैलाव से बहुत पहले से लॉकडाउन का दर्द सहन कर रहा है।

   क्षेत्र में लीमोन्ड के विशेष रिपोर्टर ने बल दिया है कि भारत सरकार ने कश्मीर में यातना के विभिन्न तरीक़े अपनाए और गिरफ्तारियां की हैं इसी तरह से भारत सरकार ने निर्वाचित नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों , मानवाधिकार के कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को जेल में डाला जबकि राज्य में अहम पदों से मुसलमानों को हटा कर हिन्दुओं को ले आया गया है।

     फ्रांस के समाचार  पत्र लीमोंड ने लिखा है कि कश्मीर में पाकिस्तान के समर्थन से तीन दशकों से विद्रोह जारी है लेकिन सीमापार से घुसपैठ काफी हद तक कम हो गयी है लेकिन भारत सरकार के गलत व्यवहार की वजह  से भारत के  खिलाफ कश्मीर में घृणा बढ़ रही है।

     कश्मीर के मुसलमानों ने भारत के साथ रहने को चुना था फिर भी उन्हें बार बार अपमानित और हिंसा का शिकार बनाया जाता है। भारत वास्तव की नींव बहुलतावाद और समानता पर आधारित है जिसे भारत के प्रधानमंत्री हिंदुत्व के नाम पर तबाह कर रहे हैं और इसके लिए मोदी सरकार, इस्लामी इतिहास  और नेहरु की विरासत की तबाही से लेकर, शिक्षित वर्ग की ज़बान बंद करने और सांसदों को खरीद कर प्रजातंत्र को खिलवाड़ बनाने जैसा कोई भी क़दम उठाने में संकोच नहीं कर रही है। कश्मीरियों की दयनीय दशा पर पश्चिमी की चुप्पी एक बहुत बड़ी गलती रही है क्योंकि मोदी की सांप्रदायिक सरकार ने जो क़दम उठाया है वह मुसलमानों के खिलाफ एजेन्डे  की दिशा में  पहला क़दम था। जिसका एक सुबूत यह है कि गत दिसंबर में मोदी ने एसा कानून बनाया जिसके आधार पर केवल मुसलमान शरणार्थियों  को भारत की नागरिकता से रोका किया था जबकि मुसलमानों के खिलाफ मोदी सरकार की भावना उस समय फरवरी में पूरी तरह से खुल कर सामने आयी जब नयी दिल्ली के उत्तरी क्षेत्रों में बलवे हुए जिसमें 50 से अधिक मुसलमान मारे गये और बहुत से मुसलमानों का कारोबार और घर बार तबाह हो गया।

  फ्रांस के लीमोंड समाचार पत्र ने लिखा कि कश्मीर पर नियंत्रण की पहली वर्षगांठ पर आज मोदी, दशकों से जारी विवाद के बाद अयोध्या में मस्जिद की जगह मंदिर निर्माण की नींव रख रहे हैं।

     लीमोंड समाचार पत्र ने फ्रांस को भी आड़े हाथो लिया है जो मानवाधिकारों की रक्षा का ढिंढोरा पीटता है।समाचार पत्र ने लिया है कि फ्रांस मानवाधिकारों की रक्षा के दावों के बावजूद दुनिया उस देश में प्रजातंत्र की मौत पर चुप्पी साधे है जो दुनिया के सब से बड़े प्रजातत्र होने का दावा करता है मगर यह लगता है कि पेरिस की सारी चिंता केवल यह है कि कैसे भारतीय सेना को राफाइल युद्धक विमान बेचे जबकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प का सारा प्रयास यह है कि वह स्वंय को नरेन्द्र मोदी का दोस्त साबित कर सकें ताकि चीन के बढ़ते प्रभाव को रोक सकें।

     फ्रांस के समाचार पत्र लीमोंड ने लिखा है कि वर्तमान समय में जब पश्चिम  चीन को संदेह की नज़र से देख रहा है वह भारत में प्रजातंत्र की दशा की अनदेखी कर रहा है और दशकों तक करता रहेगा ताकि यह दिखाया जा सके कि भारतीय उपमहाद्वीप चीन से बेहतर कारखाना है और इसी लिए अब इस बात का खतरा बढ़ रहा है कि कश्मीरी, पश्चिम की इस नीति  की बलि चढ़ जाएं क्योंकि सच्चाई यह है कि अब कश्मीरियों के मुद्दे को " आतंरिक " कह कर हल्का नहीं किया जा सकता जैसा कि मोदी की इच्छा है क्योंकि मानविधकार के हनन की नींव पर न तो शांति की इमारत खड़ी हो सकती है और न ही सच्चे प्रजातंत्र का भवन बनाया जा सकता है।