सरकार ने अपनी बड़ी परियोजनाओं को जारी रखने के लिए आम जनता की जेब हल्की करना शुरू कर दिया है जिसकी वजह से मध्यम वर्ग और ग़रीब तबक़ों की ओर से आपत्ति का स्वर उभरने लगा है अलबत्ता देश के भीतर जिस प्रकार का माहौल है उसमें खुलकर आपत्ति करने का मतलब जान गवांना है मगर सोशल मीडिया पर पकता हुआ लावा साफ़ नज़र आने लगा है।
सरकार सब्सिडी में कटौती की नीति पर अमल कर रही है तो इससे ग़रीब तबक़ा प्रभावित होगा क्योंकि उसके पास प्राइवेट सेक्टर में भी कोई विकल्प नहीं है जहां से अपनी आमदनी बढ़ा सके। रियाज़ सरकार ने अपनी 2030 नाम की महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए पैसा जुटाने के उद्देश्य से बहुत सी चीज़ों पर टैक्स की मात्रा 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दी।
आईएमएफ़ का कहना है कि तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट और कोरोना वायरस के कारण लाकडाउन ने सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था को गंभीर रूप से नुक़सान पहुंचाया है जिसके नतीजे में 2021 तक सऊदी अरब की आर्थिक विकास दर शून्य प्रतिशत रहेगी।
सऊदी सरकार ने 2018 में भी आर्थिक कटौती की नीति लागू की थी मगर आम लोगों की ओर इस पर ज़ोरदार विरोध जताया गया था और शाही सरकार को एहसास हो गया था कि वह ग़लत दिशा में बढ़ रही है।
शाही सरकार का एक सूत्रीय एजेंडा यह था कि जनता को वह सुविधापूर्ण जीवन उपलब्ध कराएगी और इसके बदले आम जनता राजनैतिक और प्रशासन मामलों में किसी तरह की दख़ल न दे। यह सिलसिला कई दशकों तक चला मगर अब इस फ़ार्मूले का पहला भाग यानी आम नागरिक का सुविधापूर्ण जीवन समाप्त हो रहा है तो क्या दूसरा भाग यानी राजनीति और सत्ता पर आले सऊद परिवार का एकाधिकार बाक़ी रह पाएगा?