जब चीन एक बड़ी शक्ति बनकर उभरा है तो यह भी तय है कि यूरोप को कुछ ज़िम्मेदारियां संभालनी होंगी जैसे एशिया में जापान ने एलान किया है कि वह अपनी सैनिक शक्ति बढ़ा रहा है क्योंकि अब अमरीका के बस की बात नहीं है कि पूरी दुनिया में सबसे बड़ी सैनिक शक्ति के रूप में ज़िम्मेदारी संभाले।
जापान की तरह अब यूरोपीय देशों को भी चाहिए कि आगे आएं और ज़िम्मेदारियों का बोझ संभालें ख़ास तौर पर वह अपने इलाक़ों में तो यह काम ज़रूर करें।
नैटो के पास मिसाइलों का बड़ा भंडार है लेकिन अब जंगों की दुनिया में जो क्रांति आई है उसके नतीजे में रूस को यह ताक़त मिल गई है कि कुछ मिनटों नहीं सेकेंडों में वह यूरोप के भीतर अमरीकी ठिकानों पर मिसाइलों और ड्रोन विमानों की आंधी ला सकता है और साथ ही इलेक्ट्रानिक यहां तक कि अंतरिक्ष हमले भी कर सकता है।
अब समय आ गया है कि अमरीका और उसके घटक सिर जोड़कर बैठें और मंथन करें कि किस तरह शक्ति के ढांचे को पुनः खड़ा किया जाए ताकि नए ख़तरों और चुनौतियों का सामना करना संभव हो सकता है।
नैटो के सदस्य देशों की ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी जीडीपी का 2 प्रतिशत ख़र्च करें लेकिन इससे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि संयुक्त रक्षा रणनीति में सक्रिय रूप से हिस्सा लें और नए सामरिक ख़तरों का इलाज करें।
अमरीका ने यूरोप के भीतर जो बड़ी बड़ी छावनियां बना रखी हैं वह टैंकों के ख़तरों का सामना करने के लिए तो ठीक हैं लेकिन अब रूस के अवान्गार्ड जैसे आधुनिक हथियारों से निपटने में सक्षम नहीं है। बल्कि यह बड़ी बड़ी छावनियां आने वाले आकस्मिक युद्ध में अमरीका और उसके घटकों की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन जाएंगी और इनको निशाना बनाकर रूस और चीन जैसे देश क्षणों में अमरीका और उसके घटकों को भारी नुक़सान पहुंचा सकते हैं।
स्रोतः नेशनल इंटरेस्ट