इस फ़ैसले से पहले, जब सोना 35 डालर प्रति आउंस था तो अगर किसी के पास 350 डालर होते थे तो वह दस आउंस सोने का मालिक होता था मगर इस फ़ैसले के बाद हुआ यह कि जिसके पास 350 डालर यानी 10 आउंस सोना था वह बाद में केवल एक आउंस सोना रह गया क्योंकि सोने की क़ीमत बढ़कार मिसाल के तौर पर 350 डालर प्रति आउंस हो गई।
अमरीका अपने साथ उन देशों को भी दीवालिया कर देने पर तुला हुआ है जिन्होंने अपना विदेशी मुद्रा भंडार डालर के रूप में रखा है।
2018 के जो आंकड़े सामने आए उनके अनुसार चीन ने 2465 अरब डालर का निर्यात किया जबकि अमरीका 1600 अरब डालर के आंकड़े से आगे नहीं जा सका। अमरीका का क़र्ज़ 22 ट्रिलियन डालर हो गया है जिसका मतलब यह है कि अमरीकी करेंसी में अब यह क्षमता नहीं रही कि वह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा भंडार की करेंसी रहे। कारण यह है कि चीन सहित दुनिया के बाक़ी सारे देशों का क़र्जा 7.1 ट्रिलियन डालर है। इसका मतलब यह है कि आईएमएफ़ के पैमाने के अनुसार भी अमरीका दीवालिया मुल्क है।
अमरीका को इस समय सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि कहीं डालर की अंतर्राष्ट्रीय करेंसी की हैसियत न ख़त्म कर दी जाए। इसलिए कि चीन, रूस, ईरान और तुर्की जैसे बड़े देशों ने अपनी स्थानीय करेंसी में व्यापार शुरू कर दिया है।
अमरीकी साम्राज्य अपने आख़िरी दिनों में पहुंच चुका है। अब अमरीका अपनी सीमाओं के भीतर सीमित रहने पर मजबूर हो रहा है क्योंकि पूरा नेटवर्क ध्वस्त हो रहा है जो अमरीका ने तैयार किया था और जिसके माध्यम से दुनिया के देशों का दोहन करता था।
इस नई स्थिति का सीधा असर इस्राईल पर पड़ने वाला है जो पूरी तरह अमरीकी साज़िश और अमरीकी मदद पर टिका हुआ है। जब अमरीका अपने भीतरी हालात में बुरी तरह उलझ जाएगा तो यह जाली शासन यानी इस्राईल ख़ुद बख़ुद बिखरने की कगार पर पहुंच जाएगा।
हालिया महीनों में कोरोना की महामारी फैली तो अमरीका की दुर्दशा पर पड़ा हुआ पर्दा पूरी तरह हट गया। इस समय अमरीका में आधे से अधिक बैंकों और उद्योगों की यह हालत है कि वह किराया अदा नहीं कर पा रहे हैं। शेल आयल कंपनियों की हालत सबसे ज़्यादा ख़राब है। देश में 42 मिलियन लोगों ने बेरोज़गारी भत्ते के लिए अपने नामों का पंजीकरण कराया है।
अप्रैल 2020 में अनुमान लगाया जा रहा था कि अमरीकी अर्थ व्यवस्था में गिरावट आएगी लेकिन इस समय जो हालत है वह अनुमान से कहीं ज़्यादा ख़राब है।
अमरीका और इस्राईल दोनों इस समय गंभीर संकट में हैं और दोनों को यह मालूम है कि आने वाला समय और भी कठिन होगा। यही वजह है कि इस समय इस्राईल और अमरीका पूरी ताक़त लगा रहे हैं कि किसी तरह हालात के रुख़ में कुछ बदलाव आ जाए। उनकी ओर से दूसरे देशों पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, लेबनान और इराक़ जैस देशों में हालात ख़राब किए जा रहे हैं, चीन की सीमाओं के पास तनाव बढ़ाया जा रहा है। सब कुछ केवल इसलिए है कि पतन की तेज़ प्रक्रिया को किसी तरह रोक जाए।
अब्दुल हैय ज़लूम
वरिष्ठ शोधकर्ता व लेखक